भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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मयूराद्यघृत ।
शतं मयूरमांसस्य दशमूलाबलातुलाम् ।
द्रोणेऽम्भसः पचेत्क्षुत्त्वा तस्मिन्पादस्थिते ततः ॥ ३९ ॥
निषिच्य पयसो द्रोणं पचेत्तत्र घृताढकम् ।
प्रपौण्डरीकवर्गौकैर्जीवनीयैश्च भेषजैः ॥ ४० ॥
मेधाबुद्धिस्मृतिकरमूर्द्धजत्रुगदापहम् ।
मायूरमेतन्निर्दिष्टं सर्वानिलहरं परम् ॥ ४१ ॥
मन्याकर्णशिरोनेत्ररुजापस्मारनाशनम् ।
विषवातामयश्वासविषमज्वरकासनुत् ॥ ४२ ॥
मोरका मांस १०० पल, दशमूल और खिरेंटी समान भाग मिश्रित १०० पल लेकर सबको एकत्र कुचलकर एक द्रोणजलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें एक द्रोण दूध और एक आढक घृत तथा पुण्डेरिया, मुलहठी, पीपल, लालचन्दन, नीलकमल, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवन्ती, मुलहठी, मुगवन और मषवन इन समस्त औषधियोंका कल्क समान भाग मिश्रित दो सेर डालकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे । यह घृत मेधा, बुद्धि और स्मृतिशक्तिको बढाता है तथा ऊर्ध्वजत्रुरोग, मन्यास्तम्भ, कर्ण शिर और नेत्ररोग, अपस्मार, विषज और वातजरोग, श्वास, विषमज्वर, खाँसी और सर्व प्रकारके वातविकारोंको नष्ट करता है । इसको मयूराद्यघृत कहते हैं ॥ ३९-४२ ॥
षड्बिन्दुवैल ।
एरण्डमूलं तगरं शताह्वा जीवन्ति रास्त्रा सहसैन्धवं
च । भृङ्गं विडङ्गं मधुयष्टिका च विश्वौषधं कृष्णतिलस्य
तैलम् ॥४३॥ आजं पयस्तैलविमिश्रितं च चतुर्गुणे भृङ्ग-
रसे विपक्वम् । षड्बिन्दवो नासिकया विधेया निहन्ति
शीघ्रं शिरसो विकारान् ॥४४॥ च्युतांश्च केशान् पलि-
तांश्च दन्तान्दुर्वद्धमूलांश्च दृढीकरोति । सुपर्णदृष्टिप्रतिमं
च चक्षुर्बाह्वोर्बलं चाप्यधिकं ददाति ॥ ४५ ॥
अण्डकी जड, तगर, सोया, जीवन्ती, रास्ना, सेंधानमक भाँगरा, वायविडङ्ग, मुलहठी, सोंठ और कालेतिलोंका तेल और बकरीका दूध इन सबको