भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२१९
समान भाग लेकर यथाविधिसे मिश्रित करके तेलको पकावे । इस षड्बिन्दुनामक तेलको नस्यद्वारा प्रयोग करे । यह शिरके समस्त विकारोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है तथा बालोंका गिरना और पलितरोगको दूरकर हिलतेहुए दाँतोंकी जड़ोंकों मजबूत करता है । एवं नेत्रोंकी दृष्टिशक्तिको गरुडकी समान अत्यन्त सूक्ष्म और भुजाओंमें अनन्त बलकी वृद्धि करता है ॥ ४३–४५ ॥
दशमूलतैल १–२ ।
दशमूलक्वाथकल्काभ्यां तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।
चतुर्गुणं पयो दत्त्वा शनैर्मृद्वग्निना भिषक् ॥ ४६ ॥
दशमूलमिति ख्यातं शोथं हन्ति सुदारुणम् ।
नस्येनाकालपलितं ज्वरारोचकनाशनम् ॥ ४७ ॥
अभ्यङ्गेनैव सर्वं च शिरःशूलं विनाशयेत् ॥ ४८ ॥
१–दशमूलकी औषधियोंके क्वाथ और कल्कके साथ कडवातैल एक प्रस्थ और दूध ४ प्रस्थ मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे यथाविधि तेलको पकावे । इसको दशमूल तेल कहते हैं । यह तेल दारुण शोथको नष्ट करता है और नस्यद्वारा उपयोग करनेसे असमय बालोंका पकना, ज्वर, अरुचि आदि विकारोंका तथा मालिश करनेसे सर्वप्रकारके शिरःशूलको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ४६–४८ ॥
दशमूलीकषायेण अष्टाङ्गकल्कसंयुतम् ।
क्षीरं च द्विगुणं दत्त्वा तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ४९ ॥
२–दशमूलके क्वाथके साथ जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि और वृद्धि इन औषधियोंका कल्क तथा एक प्रस्थ कडवा तेल और दो प्रस्थ दूध मिलाकर विधिपूर्वक तेलको सिद्ध करे ॥ ४९ ॥
शिरोऽर्त्तिं नाशयेदेतद्भास्करस्तिमिरं यथा ।
वातशूलं पित्तशूलं कफशूलं त्रिदोषजम् ॥ ५० ॥
सूर्यावर्त्तमभिष्यन्दं जलदोषं च नाशयेत् ।
दशमूलमिदं तैलं शिरोरोगनिषूदनम् ॥ ५१ ॥
यह तेल शिरोरोगको इस प्रकार नाश करदेता है जिस प्रकार सूर्य अन्धकारपुञ्जको तत्क्षण नष्ट करता है । इससे वातज, पित्तज, कफज और त्रिदोषजशूल, सूर्यावर्त्तशिरोरोग, नेत्राभिष्यन्द और जलदोष दूर होता है । यह दशमूलतेल समस्त शिरोरोगोंका नाश करनेवाला है ॥ ५० ॥ ५१ ॥