भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1253

-चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२२१

एकजे द्वन्द्वजे चैव तथैव सन्निपातिके । अर्द्धावभेदके चैव सूर्यावर्त्ते प्रशस्यते ॥ पानाभ्यञ्जननस्येन कर्णरोगे च शस्यते ॥ ६० ॥

१—दशमूलकी प्रत्येक औषधिको बीस बीस तोले लेकर एक द्रोण (३२ सेर) जलमें पकावे। जब पकते २ आठवाँ हिस्सा जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे। फिर उसमें अदरखका रस १ प्रस्थ, निर्गुण्डीके पत्तोंका रस एक प्रस्थ तथा त्रिकुटा, पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, जीरा, कालाजीरा, सफेद सरसों, सैंधानमक, जवाखार, निसोंत, हल्दी और दारुहल्दी इन औषधियोंका कल्क दोदों तोले और पाकके लिये रसोंसे दुगुना जल डालकर सबको यथाविधिसे एकत्र करके तेलको पकावे। यह तेल सम्पूर्ण शिरोरोग, ऊर्ध्वजत्रुजनित रोग और वात तथा कफजन्य रोगोंको दूर करता है। इसको एकदोषज, द्विदोषज तथा त्रिदोषज अर्द्धावभेदक और सूर्यावर्त रोगमें तथा कर्णरोगमें पान, अभ्यञ्जन और नस्यद्वारा प्रयोग करना ॥

दशमूलीशतं ग्राह्यं तथा धुस्तूरकस्य च ॥ शतं पुनर्नवायाश्च निर्गुण्ड्याश्च शतं तथा ॥ ६१ ॥ एतैः कषायैर्विपचेत्कटुतैलाढकं भिषक् । वासा वचा देवदारु शठी रास्ना सयष्टिका ॥ ६२ ॥ मरिचं पिप्पली शुण्ठी कारवी कट्फलं तथा । करञ्जं शिग्रु कुष्ठं च चिञ्चा च वनशिम्बिका ॥ ६३ ॥ चित्रकं च पृथग् भागान् दत्त्वा चैषां पलोन्मितान् ॥ ६४॥

२—दशमूल, धतूरा, पुनर्नवा और निर्गुण्डी ये प्रत्येक औषधि सौ सौ पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे। चतुर्थांश शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे। फिर उसमें कडवा तेल एक आढक तथा अडूसा, वच, देवदारु, कचूर, रास्ना, मुलहठी, मिरच पीपल, सोंठ, कालाजीरा, कायफल, करञ्ज, सहिंजना, कूठ, इमली, वनसेम और चीतेकी जड इन सबका कल्क पृथक् पृथक् चार चार तोले डालकर उत्तम प्रकार तेलको सिद्ध करे ॥ ६१-६४ ॥

श्लैष्मिकं सन्निपातोत्थं वातश्लेष्मोद्भवं तथा । कर्णशूलं शिरःशूलं नेत्रशूलं च दारुणम् ॥ निहन्ति दशमूलाख्यं तैलमेतन्न संशयः ॥ ६५ ॥