भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२२७
वस्तिः । रक्तोन्मुक्तिर्वह्निकर्मोपनाहो जीर्णं सर्पिः शालयः षष्टिकाश्च ॥ ९९ ॥ यूषो दुग्धं धन्वमांसं पटोलं शिग्रु- द्राक्षा वास्तुकं कारवेल्लम् । आम्रं धात्री दाडिमं मातु- लुङ्गं तैलं तक्रं काञ्जिकं नारिकेलम् ॥ १०० ॥ पथ्या कुष्ठं भृङ्गराजः कुमारी मुस्तोशीरं चन्द्रिका गन्धसारः । कर्पूरं च ख्यातिमानेष वर्गः सेव्यो मर्त्यैः शीर्षरोगे यथास्वम् ॥ १०१ ॥
शिरोरोगमें स्वेद, नस्य देना, धूमपान, विरेचन, लेप, वमन, लंघन, शिरोवस्ति, रक्तमोक्षण, अग्निकर्म, शिरपर लेप करना, पुराना घी, शालिके चावल और सांठीके चावल, मूँगका यूष, दूध, मरुदेशके जीवोंका मांस, परवल, सहिंजना, दाख, बथुआ, करेला, आम, आमले, अनार, बिजौरानींबू, तेल, मट्ठा, काँजी, नारियल, हरड, कूट, भाँगरा, घीग्वार, नागरमोथा, खस, इलायची, सफेदचंदन और कपूर इन समस्त औषधियोंको यथादोषानुसार सेवन करे ॥ १०१ ॥
शिरोरोगमें अपथ्य ।
क्षवजृम्भासूत्रबाष्पनिद्राविङ्वेगमञ्जनम् । दुष्टनीरं विरुद्धान्नं सह्यविन्ध्यसरिज्जलम् ॥ दन्तकाष्ठं दिवानिद्रां शिरोरोगी परित्यजेत् ॥ १०२ ॥
छींक, जमुहाई, मूत्र, आँसू, निद्रा और मल इनके वेगको रोकना, अंजन लगाना, दूषित जलपान, विरुद्ध अन्न भोजन, सह्य और विन्ध्य आदि पर्वतोंकी नदियोंका जल, दातोन और दिनमें शयन करना इन सबको शिरोरोगी त्यागदेवे ॥ १०२ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां शिरोरोगचिकित्सा ॥
प्रदररोगकी चिकित्सा ।
दध्ना सौवर्चलाजाजी मधुकं नीलमुत्पलम् । पिबेत्क्षौद्रयुतं नारी वातासृग्दरपीडिता ॥ १ ॥
वातज प्रदररोगमें उक्त रोगसे पीडित स्त्री कालानमक, जीरा, मुलहठी, नीलाकमल और शहद इन सबको समान भाग लेकर दहीके साथ खरल करके प्रतिदिन पान करे ॥ १ ॥