भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1260

१२२८ । भैषज्यरत्नावली । [ प्रदररोग-

पिबेदैणेयं रक्तं शर्करामधुसंयुतम् ॥ काले हिरनके रक्तको खाँड और मधुमें मिश्रित करके पान करनेसे अधिक स्राव युक्त पित्तज रक्तप्रदररोग दूर होता है ॥

कुशमूलं समुद्धृत्य पेषयेत्तण्डुलाम्बुना । एतत्पीत्वा त्र्यहान्नारी प्रदरात्परिमुच्यते ॥ २ ॥ कुशाकी जडको चावलोंके जलमें पीसकर पान करनेसे तीन दिनमें ही स्त्री प्रदर-रोगसे मुक्त होजाती है ॥ २ ॥

अशोकवल्कलक्वाथे शृतं दुग्धं सुशीतलम् । यथाबलं पिबेत्प्रातस्तीव्रासृग्दरनाशनम् ॥ ३ ॥ अशोकके वृक्षकी छालके क्वाथमें दूधको पकाकर शीतल होजानेपर अग्निके बलाबलको विचारकर प्रतिदिन प्रातःकाल पान करनेसे स्त्रियोंका तीव्र प्रदररोग नष्ट होता है ॥ ३ ॥

क्षौद्रयुक्तं फलरसं काष्ठोदुम्बरजं पिबेत् । असृग्दरविनाशाय सशर्करपयोऽन्नभुक् ॥ ४ ॥ शहदके साथ गूलरके रसको अथवा चीनी और दूधके साथ अन्नको भोजन करनेसे रक्तप्रदररोग शान्त होता है ॥ ४ ॥

प्रदरं हन्ति बलाया मूलं दुग्धेन संयुतं पीतम् । कुशवाट्यालकमूलं तण्डुलसलिलेन रक्ताख्यम् ॥ ५ ॥ खिरैंटीकी जडको जलमें पीसकर और दूधमें मिलाकर पान करे । अथवा कुशा और खिरैंटीकी जडको चावलोंके पानीमें पीसकर पान करे तो रक्तज प्रदर दूर होता है ॥ ५ ॥

गुडेन बदरीचूर्णं मोचमामं तथा पयः । पीता लाक्षा च सघृता पृथक् प्रदरनाशनम् ॥ ६ ॥ बेरीके पत्तोंके चूर्णको गुडके साथ, कच्चा केलेकी फलीके चूर्णको दूधके साथ किम्वा लाखके चूर्णको घृतमें मिलाकर सेवन करनेसे प्रदररोग नष्ट होता है ॥ ६ ॥

रक्तपित्तविधानेन प्रदरांश्चाप्युपाचरेत् । रक्तातीसारवद्वाथ रक्तार्शोवत्तथैव च ॥ ७ ॥ रक्तपित्त, रक्तातीसार और रक्तार्शारोगकी चिकित्साके अनुसारही रक्तप्रदररोगकी चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ७ ॥