भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२२९


असृग्दरे विशेषेण कुटजाष्टकमिष्यते ॥
विशेषकर रक्तप्रदररोगमें अतीसारमें कहाहुआ कुटजाष्टक उपयोगी है ॥

रोहितकमूलकल्कं पाण्डुरेऽसृग्दरे पिबेत् ।
जलेनामलकीबीजकल्कं वा ससितामधु ॥ ८ ॥

रोहेडा वृक्षकी जडकी छालको पीसकर मिश्री और शहदमें मिलाकर अथवा आमलोंकी गुठलीकी मींगको जलमें पीसकर, मिश्री और शहदमें मिलाकर पान करना पाण्डुप्रदररोगमें हितकारी है ॥ ८ ॥

धातक्याश्चाक्षमात्रं वा आमलक्या मधुद्रवम् ।
काकजङ्घामूलं वा मूलं कार्पासमेव वा ॥
पाण्डुप्रदरशान्त्यर्थं पिबेत्तण्डुलवारिणा ॥ ९ ॥

श्वेतप्रदरको नष्ट करनेके लिये धायके फूल अथवा आमलोंको दो तोले प्रमाण लेकर जलमें पीसकर शहदके साथ किंवा काकजङ्घाकी जडको या कपासकी जडको पीसकर चावलोंके जलके साथ पान करे ॥ ९ ॥

शर्करामधुकं शुण्ठी तैलं दधि च तत्समम् ।
खजेन मथितं पीतं हन्याद्वातोत्थितं रजः ॥ १० ॥

खाँड, मुलहठी, सोंठ, तिलका तेल और दही; इनको समान भाग लेकर सबको एकत्र करछौसे मथकर पीवे तो वातज रक्तप्रदर दूर होता है ॥ १० ॥

वासकस्वरसं पित्ते गुडूच्या रसमेव वा ।
धात्रीरसं सितायुक्तं योनिदाहापहं पिबेत् ॥ ११ ॥

पैत्तिकप्रदररोगमें अडूसेके स्वरसको अथवा गिलोयके स्वरसको पान करें और आमलोंके स्वरसको मिश्री डालकर पान करनेसे योनिदाह दूर होता है ॥

भूम्यामलकचूर्णं च पीतं तण्डुलवारिणा ।
दिनत्रयान्तरेणैव स्त्रीरोगं नाशयेद् ध्रुवम् ॥ १२ ॥

भुईंआमलेके चूर्णको चावलोंके जलके साथ पीनेसे ३ दिनमेंही स्त्रियोंका प्रदर-रोग निश्चयरूपसे नष्ट होता है ॥ १२ ॥

रक्तपित्तहरः सर्वः प्रदरे नूतने विधिः ।
रक्तातीसारयोगं च सर्वमत्र प्रयोजयेत् ॥ १३ ॥

नवीन प्रदररोगमें रक्तपित्तनाशक और रक्तातीसार रोगकी भाँति सम्पूर्ण चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १३ ॥