भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२२९
असृग्दरे विशेषेण कुटजाष्टकमिष्यते ॥
विशेषकर रक्तप्रदररोगमें अतीसारमें कहाहुआ कुटजाष्टक उपयोगी है ॥
रोहितकमूलकल्कं पाण्डुरेऽसृग्दरे पिबेत् ।
जलेनामलकीबीजकल्कं वा ससितामधु ॥ ८ ॥
रोहेडा वृक्षकी जडकी छालको पीसकर मिश्री और शहदमें मिलाकर अथवा आमलोंकी गुठलीकी मींगको जलमें पीसकर, मिश्री और शहदमें मिलाकर पान करना पाण्डुप्रदररोगमें हितकारी है ॥ ८ ॥
धातक्याश्चाक्षमात्रं वा आमलक्या मधुद्रवम् ।
काकजङ्घामूलं वा मूलं कार्पासमेव वा ॥
पाण्डुप्रदरशान्त्यर्थं पिबेत्तण्डुलवारिणा ॥ ९ ॥
श्वेतप्रदरको नष्ट करनेके लिये धायके फूल अथवा आमलोंको दो तोले प्रमाण लेकर जलमें पीसकर शहदके साथ किंवा काकजङ्घाकी जडको या कपासकी जडको पीसकर चावलोंके जलके साथ पान करे ॥ ९ ॥
शर्करामधुकं शुण्ठी तैलं दधि च तत्समम् ।
खजेन मथितं पीतं हन्याद्वातोत्थितं रजः ॥ १० ॥
खाँड, मुलहठी, सोंठ, तिलका तेल और दही; इनको समान भाग लेकर सबको एकत्र करछौसे मथकर पीवे तो वातज रक्तप्रदर दूर होता है ॥ १० ॥
वासकस्वरसं पित्ते गुडूच्या रसमेव वा ।
धात्रीरसं सितायुक्तं योनिदाहापहं पिबेत् ॥ ११ ॥
पैत्तिकप्रदररोगमें अडूसेके स्वरसको अथवा गिलोयके स्वरसको पान करें और आमलोंके स्वरसको मिश्री डालकर पान करनेसे योनिदाह दूर होता है ॥
भूम्यामलकचूर्णं च पीतं तण्डुलवारिणा ।
दिनत्रयान्तरेणैव स्त्रीरोगं नाशयेद् ध्रुवम् ॥ १२ ॥
भुईंआमलेके चूर्णको चावलोंके जलके साथ पीनेसे ३ दिनमेंही स्त्रियोंका प्रदर-रोग निश्चयरूपसे नष्ट होता है ॥ १२ ॥
रक्तपित्तहरः सर्वः प्रदरे नूतने विधिः ।
रक्तातीसारयोगं च सर्वमत्र प्रयोजयेत् ॥ १३ ॥
नवीन प्रदररोगमें रक्तपित्तनाशक और रक्तातीसार रोगकी भाँति सम्पूर्ण चिकित्सा करनी चाहिये ॥ १३ ॥
| १२३० | भैषज्यरत्नावली । | [ प्रदररोग- |
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मूलं च शरपुंखायाः पेषयेत्तण्डुलाम्बुना ।
पीत्वा च कर्षमात्रं तु अतिरक्तं प्रशान्तयेत् ॥ १४ ॥
शरफोंकाकी जडको दो तोले लेकर चावलोंके जलमें पीसकर पान करनेसे रक्त-का स्राव होना बन्द होता है ॥ १४ ॥
धात्र्यञ्जनाभयाचूर्णं तोयपीतं रजो हरेत् ।
शेलुच्छदमिश्रपिष्टं भक्षणं च तदर्थकृत् ॥ १५ ॥
आमले, रसौत और हरड इनके चूर्णको पीसकर अथवा लहसौडोंके पत्तोंको मिलाकर चावलोंके वडेके साथ भक्षण करनेसे रक्तस्राव दूर होता है ॥ १५ ॥
वासाकषायसहितं रसभस्म प्रयोजितम् ।
प्रदरं हन्ति वेगेन सक्षौद्रं नात्र संशयः ॥ १६ ॥
अडूसेके क्वाथके साथ शहद और रससिंदूर मिलाकर सेवन करनेसे वेगसे होनेवाला प्रदररोग निस्सन्देह नष्ट होता है ॥ १६ ॥
दार्व्यादि ।
दार्वी--रसाञ्जनवृषाब्दकिरातबिल्व भल्लातकैरवकृतो
मधुना कषायः । पीतो जयत्यतिबलं प्रदरं सशूलं
पीतासितारुणविलोहितनीलशुक्लम् ॥ १७ ॥
दारुहल्दी, रसौत, अडूसेकी छाल, नागरमोथा, चिरायता, बेलगिरी और लाल चंदन इनका एकत्र क्वाथ बनाकर शहदमें मिलाकर पान करनेसे शूलयुक्त अतिप्रबल पीतप्रदर असितप्रदर रक्तप्रदर विलोहितप्रदर नीलप्रदर और श्वेतप्रदरादि सब प्रकारके प्रदर नाशको प्राप्त होते है ॥ १७ ॥
चंदनादिचूर्ण ।
चन्दनं नलदं लोध्रमुशीरं पद्मकेशरम् ।
नागपुष्पं च बिल्वं च भद्रमुस्तं च शर्करा ॥ १८ ॥
ह्रीबेरं चैव पाठा च कुटजस्य फलत्वचम् ।
शृङ्गवेरं सातिविषा धातकी च रसाञ्जनम् ॥ १९ ॥
आम्रास्थि जम्बुसारास्थि तथा मोचरसोद्भवः ।
नीलोत्पलं समङ्गा च सूक्ष्मैला दाडिमोद्भवम् ॥ २० ॥
चतुर्विंशतिमेतानि समभागानि कारयेत् ।
तण्डुलोदकसंयुक्तं मधुना सह योजयेत् ॥ २१ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता १२३१
लालचंदन, जटामांसी, लोध, खस, कमलकी केशर, नागकेशर, बेलगिरी, नागरमोथा, खाँड, सुगंधवाला, पाठ, इन्द्रजौ, कुडेकी छाल, सोंठ, अतीस, धायके फूल, रसौत, आमकी गुठलीकी मींग, जामुनकी गुठलीकी मींग, मोचरस, नीले कमलका फूल, वराहक्रान्ता, छोटी इलायची और अनारकी छाल इन चौबीसों औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र कूट पीसकर कपड छान करके चूर्ण बना- लेवे। इस चूर्णको प्रतिदिन तीन तीन मासे परिमाण लेकर चावलोंके जल और मधुमें मिश्रित करके सेवन करे ॥ १८-२१ ॥
चतुःप्रकारं प्रदरं रक्तातीसारमुल्बणम् ।
रक्तार्शांसि निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥
अश्विन्योः सम्मतो योगो रक्तपित्तनिबर्हणः ॥ २२ ॥
यह चूर्ण चार प्रकारके प्रदररोगको तथा दारुण रक्तातिसार और रक्तार्शको तत्काल नष्ट करता है जिस प्रकार सूर्य अंधकारराशिको शीघ्र नष्ट कर देता है । इसको अश्विनीकुमारोंने रचा है। यह योग रक्तपित्तनाशक है ॥ २२ ॥
पुष्यानुगचूर्ण ।
पाठा जम्ब्वाम्रयोर्मध्यं शिलाभेदं रसाञ्जनम् ।
अम्बष्ठकी मोचरसः समङ्गा पद्मकेशरम् ॥ २३ ॥
बाह्लिकातिविपामुस्तं बिल्वं लोध्रं सगैरिकम् ।
कट्फलं मरिचं शुण्ठी मृद्वीका रक्तचन्दनम् ॥ २४ ॥
कट्वङ्गवत्सकानन्ता धातकी मधुकार्जुनम् ।
पुष्येणोद्धृत्य तुल्यानि श्लक्ष्णचूर्णानि कारयेत् ॥
तानि क्षौद्रेण संयोज्य पाययेत्तण्डुलाम्बुना ॥ २५ ॥
पाठ, जामुन और आमकी गुठलियोंकी मींग, पाषाणभेद, रसौत, अम्बष्ठकी (मोईयावृक्ष), मोचरस, वराहक्रान्ता, कमलकेशर, अतीस, नागरमोथा, बेल- गिरी, लोध, गेरू, कायफल, मिरच, सोंठ, दाख, लालचंदन, सोनापाठेकी छाल, इन्द्रजौ, अनंतमूल, धायके फूल, मुलहठी और अर्जुनकी छाल इन सब औष- धियोंको पुष्यनक्षत्रमें उद्धृत करके समान भाग लेकर बारीक कूट पीसकर चूर्ण बनालेवे । फिर उस चूर्णको शहद और चावलोंके जलके साथ मिलाकर सेवन करे ॥ २३-२५ ॥
अर्शःसु चातिसारेषु रक्तं यच्चोपवेश्यते ।
दोषागन्तुकता ये च बालानां तांश्च नाशयेत् ॥ २६ ॥
१२३२ भैषज्यरत्नावली । [ प्रदररोग
योनिदोषं रजोदोषं श्वेतं नीलं सपीतकम् ।
स्त्रीणां श्यावारुणं यच्च तत्प्रसह्य निवर्त्तयेत् ॥ २७ ॥
चूर्णं पुष्यानुगं नाम हितमात्रेयपूजितम् ।
अम्बष्ठा दक्षिणे ख्याता गृह्णन्त्यन्ये तु लक्षणाः ॥ २८ ॥
अर्श और रक्तातीसारमें इसको प्रयोग करना उपयोगी है। यह चूर्ण बालकोंके जितने भी आगन्तुक रोग हैं उन सबको और स्त्रियोंके योनिदोष, श्वत, नील, पीत, श्याम और अरुण प्रदररोगोंको बहुत शीघ्र नष्ट करता है। यह पुष्यानुगनामक चूर्ण उक्त रोगोंमें विशेष हितकारी है और आत्रेय करके पूजित है ॥ २६-२८॥
उत्पलादि ।
कन्दं रक्तोत्पलस्याथ रक्तकार्पासमुलकम् ।
करवीरस्य मूलानि तथा रक्तोद्रमूलकम् ॥ २९ ॥
बकुलस्य तथा मूलं गन्धमातृकजीरकौ ।
रक्तचन्दनकं चैव समभागं च कारयेत् ॥ ३० ॥
तण्डुलोदकसंविष्टं रक्तमूत्राय दापयेत् ।
योनिशूलं कटीशूलं कुक्षिशूलं च नाशयेत् ॥
योनिशूलहरः प्रोक्त उत्पलादिर्न संशयः ॥ ३१ ॥
लालकमलकी जड, लालकपासकी जड, लालकनेरकी जड, लालगुडहलकी जड, बक वृक्षकी जड, गन्धमात्रा, जीरा और लाल चन्दन इनको बराबर २ लेकर एकत्र कूट पीसकर चूर्ण बनालेवे । इसको चावलोंके पानीमें पीसकर और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे रक्तमूत्र, योनिशूल, योनिशूल, कटिशूल और कुक्षिशूल नाश होता है। यह उत्पलादि चूर्ण योनिशूलको निस्सन्देह नष्ट करता है ॥
मधुकाद्यवलेह ।
मधुकं चन्दनं लाक्षा रक्तोत्पलरसाञ्जनम् ।
कुशवीरणयोर्मूलं बलावासकयोस्तथा ॥ ३२ ॥
कोलमज्जाम्बुदं बिल्वं पिच्छा दार्वा च धातकी ।
अशोकवल्कलं द्राक्षा जवाकुसुममस्फुटम् ॥ ३३ ॥
आम्रजम्बुकिसलयं कोमलं नलिनीदलम् ।
शतमूली विदारी च रजतं लौहमभ्रकम् ॥ ३४ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३३
एषां कोलमितं चूर्णं द्विगुणा सितशर्करा ।
वरीरसस्य प्रस्थार्द्धे पचेन्मन्देन वह्निना ॥ ३५ ॥
घनीभूते क्षिपेच्चूर्णं शीतीभूते पलं मधु ।
मधुकाद्यवलेहोऽयं महादेवेन भाषितः ॥ ३६ ॥
मुलहठी, लालचन्दन, लाख, लालकमल, रसौत, कुशमूल, वीरणमूल, वलिआरंकी जड, अडूसेकी मूल, बेरकी गुठलीकी मींग, नागरमोथा, बेलगिरी, मोचरस, दारुहल्दी, धायके फूल, अशोकवृक्षकी छाल, दाख, गुड़हलके फूलकी कली, आम और जामुनके कोमल पत्ते, कमलपत्र, शतावर, विदारीकन्द, रौप्यभस्म, लोहभस्म और अभ्रकभस्म इनके चूर्ण को दोदो तोले और सब चूर्णसे दुगुनी मिश्री लेवे । प्रथम मिश्रीको शतावरके एक प्रस्थ रसमें डालकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें उपर्युक्त औषधियोंका चूर्ण डाले, फिर शीतल होजानेपर चार तोले शहद डालकर सबको एकमएक करलेवे । श्रीम-हादेवजीने इस मधुकाद्यवलेहको कथन किया है ॥ ३२-३६ ॥
दुस्तरं प्रदरं हन्ति नानावर्णं सवेदनम् ।
योनिशूलं कुक्षिशूलं बस्तिशूलं सुदुःसहम् ॥ ३७ ॥
रक्तातिसारं रक्तार्शो रक्तपित्तं चिरोद्भवम् ।
मूत्ररोगानशेषांश्च दाहं मोहं वमिं भ्रमिम् ॥
नाशयेन्नात्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३८ ॥
यह अवलेह दुस्तर और वेदनायुक्त विविधप्रकारके प्रदर, योनिशूल, कुक्षिशूल, दुस्सह बस्तिशूल, रक्तातीसार, रक्तार्श, पुराने रक्तपित्त, मूत्रके समस्त विकार, दाह, मोह वमन और भ्रमादि सर्वप्रकारके रोगोंको इस प्रकार नष्ट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य अन्धकारको दूर करता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
प्रदरान्तकरस ।
शुद्धसूतं तथा गन्धं शुद्धवङ्गरूप्यकम् ।
खर्परं च वराटं च शाणमानं पृथक्पृथक् ॥ ३९ ॥
त्रितोलक मितं चैव लौहचूर्णं क्षिपेत्सुधीः ।
कन्यानीरेण संमर्द्य दिनमेकं भिषग्वरः ॥
असाध्यं प्रदरं हन्ति भक्षणात्रात्र संशयः ॥ ४० ॥
७८
१२३४ भैषज्यरत्नावली । [ प्रदररोग
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध वङ्गभस्म, रौप्यभस्म, खपरियाभस्म और कौडीकी भस्म इन सबको अलग अलग चार चार माशे और लोहेका चूर्ण तीन तोले लेवे । फिर सबको एकत्रकर घग्वारके रसके साथ एक दिनपर्यन्त खरल करके दोदो रत्तीकी गोलियां बनालेवे । इस रसको सेवन करनेसे सर्वप्रकारका असाध्य प्रदररोग भी सन्देहरहित नष्ट होता है ॥ ३९ ॥ ४० ॥
प्रदरारिलौह !
वत्सकस्य तुलां सम्यग् जलद्रोणे विपाचयेत् । अष्टभागावशिष्टं च कषायमवतारयेत् ॥ ४१ ॥ वस्त्रपूते घनीभूते द्रव्याणीमानि दापयेत् । समङ्गा शाल्मलं पाठा बिल्वं मुस्तं च धातकी ॥ ४२ ॥ अरुणा व्योमकं लोहं प्रत्येकं च पलं पलम् । कोलमात्रं प्रयुञ्जीत कुशमूलं पयो ह्यनु ॥ ४३ ॥ श्वेतं रक्तं तथा नीलं पीतं प्रदर दुस्तरम् । कुक्षिशूलं कटीशूलं देहशूलं च सर्वगम् ॥ ४४ ॥ प्रदरारिरयं लौहो हन्ति रोगान्सुदुस्तरान् । आयुःपुत्रकरश्चैव बलवर्णाग्निवर्द्धनः ॥ ४५ ॥
कुडेकी छालको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते अष्टमांश जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उस क्वाथको दुबारा चूल्हेपर रखकर पकावे । जब पाक गाढा होजाय तब उसमें वराहक्रान्ता, मोचरस, पाठ, बलगिरी, नागरमोथा, धायके फूल, अतीस, अभ्रक और लोहा इन औषधियोंको चार चार तोले लेकर बारीक पीसकर डालदेवे और सबको एकमएक करदेवे । इसको एक तोला प्रमाण लेकर कुशाकी जडको जलमें पीसकर उस जलके साथ सेवन करे तो यह प्रदरारिलोह श्वेत, लाल, नीले और पीले दुस्तर प्रदरको तथा कुक्षिशूल, कटिशूल, सर्व शरीरगत शूल, इनके अतिरिक्त अन्यान्य दुस्तर रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं आयु, बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि करता है तथा पुत्रको उत्पन्न करता है ॥ ४१-४५ ॥
सर्वाङ्गसुन्दररस ।
गगनं शोधितं ग्राह्यं पलैकमिष्टकासमम् । टङ्कणं स्याच्चतुर्थांशं शाणार्द्धं त्रिसुगन्धिकम् ॥ ४६ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३५
कर्पूरं नलदं चैव जातीकोषं जलं घनम् ।
नागेश्वरं लवङ्गं च कुष्ठं सत्रिफलं तथा ॥
जलेन वटिका कार्या छायया शोषयेत्तु ताम् ॥ ४७ ॥
शुद्ध अभ्रक चार तोले, सुहागेकी खील एक तोला तथा दारचीनी, इलायची, तेजपात, कपूर, खस, जावित्री, सुगन्धवाला, नागरमोथा, नागकेशर, लौंग, कूठ और त्रिफला इन प्रत्येक औषधिको दो दो माशे लेकर सबको एकत्र जलके द्वारा खरल कर गोलियाँ बनालेवे । फिर उनको छायामें सुखाकर रख लेवे ॥ ४६ ॥ ४७ ॥
प्रदरं नाशयेत्सर्वं साङ्गमर्दं सवेदनम् ।
अशीतिं वातजान्रोगान्मन्दाग्निमतिदारुणम् ॥ ४८ ॥
सज्वरग्रहणीं चैव रक्तपित्तमरोचकम् ॥
कासान्पञ्च प्रतिश्यायं श्वासं हृद्रोगमेव च ॥ ४९ ॥
इस रसको सेवन करनेसे अङ्गोंका टूटना और वेदनायुक्त सर्वप्रकारका प्रदररोग नष्ट होता है । यह अस्सी प्रकारके वातज रोग, मन्दाग्नि, दारुण ज्वरसहित संग्रहणी, रक्तपित्त, अरुचि, पाँच प्रकारकी खाँसी, प्रतिश्याय ( जुकाम ), श्वास और हृदयरोगको नष्ट करता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥
रत्नप्रभावटिका ।
स्वर्णमौक्तिकमभ्रं च नागं वङ्गं च पित्तलम् ।
माक्षिकं रजतं वज्रं लौहं तालं च खर्परम् ॥ ॥ ५० ॥
कदल्याः काकमाच्याश्च वासकस्योत्पलस्य च ।
स्वरसेन जयन्त्याश्च कर्पूरसलिलेन च ॥ ५१ ॥
भावयित्वा यथाशास्त्रमहोरात्रमतः परम् ।
सम्मर्द्यातन्द्रितः कुर्याद्भिषग्गुञ्जामिता वटीः ॥ ५२ ॥
सुवर्ण, मोती, अभ्रक, सीसा, वङ्ग, पीतल, सोनामाखी, चाँदी, हीरा, लोहा, हरिताल और खपरिया इन सबकी भस्मोंको समान भाग लेकर केलेकी जड, मकोय, अडूसेकी छाल, कमल और जयन्तीके पत्ते इन सबोंके स्वरस तथा कपूरके जलमें यथाक्रम भावना देकर शास्त्रोक्त विधिसे एक दिनरात्रिपर्यन्त निरालस्य होकर उत्तम प्रकार खरल करे, फिर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ ५०-५२ ॥
| १२३६ | भैषज्यरत्नावली। | [प्रदररोग- |
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एकैकां च प्रयुञ्जीत प्रातराशं बलाम्बुना ।
उष्णेन पयसा वापि केशराजरसेन वा ॥ ५३ ॥
इयं रत्नप्रभानाम्नी वटिका सर्वसिद्धिदा ।
सर्वस्त्रीरोगहन्त्री च बल्या वृष्या रसायनी ॥ ५४ ॥
इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोलीको खिरैंटीके क्वाथ अथवा कुकुरभाँगरेके रस किम्वा मन्दोष्ण दूधके साथ सेवन करे । यह रत्नप्रभानामवाली वटी सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली और स्त्रियोंके समस्त रोगोंको हरनेवाली तथा बलकारक, पुष्टिकारक और रसायन है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥
सितकल्याणघृत ।
कुमुदं पद्मकोशीरं गोधूमं रक्तशालयः ।
मुद्गपर्णी पयस्या च काश्मरी मधुयष्टिका ॥ ५५ ॥
बलातिबलयोर्मूलमुत्पलं तालमस्तकम् ।
विदारी शतपुत्री च शालपर्णी सजीरका ॥ ५६ ॥
फलं त्रपुषबीजानि प्रत्यग्रं कदलीफलम् ।
एषामर्द्धपलान्भागान् गव्यक्षीरं चतुर्गुणम् ॥ ५७ ॥
पानीयं द्विगुणं दत्त्वा घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ५८ ॥
कमोदनीके फूल, पद्माख, खस, गेहूं, लाल शालिचावल, मुगवन, क्षीर काकोली, कुम्मेर, मुलहठी, खिरेंटी, कंघीकी जड, लालकमल, ताडका मस्तक, विदारीकन्द, शतावर, शालपर्णी, जीरा, त्रिफला, ककडीके बीज और कच्ची केलेकी फली इन सबको दो दो तोले लेकर एकत्र कूटपीसकर कल्क बनाले, फिर घृतसे चौगुना गोदुग्ध, दुगुना पानी और एक प्रस्थ घी लेवे, सबको यथाविधि एकत्र मिलाकर उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करना चाहिये ॥ ५५-५८ ॥
प्रदरे रक्तगुल्मे च रक्तपित्ते हलीमके ।
बहुरूपं च यत्पित्तं कामलायां च शोणिते ॥
अरोचके ज्वरे जीर्णे पाण्डुरोगे मदे भ्रमे ॥ ५९ ॥
तरुणी चाल्पपुष्पा च या च गर्भं न विन्दति ।
अहन्यहनि च स्त्रीणां भवति प्रीतिवर्द्धनम् ॥ ६० ॥
यह घृत प्रदर, रक्तगुल्म, रक्तपित्त, हलीमक, अनेक प्रकारके पित्तरोग, कामला, रक्तस्राव, अरुचि, जीर्णज्वर, पाण्डुरोग, मद और भ्रमादि रोगोंमें सेवन
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३७
करना परमोपयोगी है । जो तरुणी स्त्री अल्प पुष्पवाली होती है और गर्भको धारण नहीं करती उसके इस घृतके प्रभावसे अवश्य गर्भधारण होता है । इससे स्त्रियोंकी दिनप्रतिदिन प्रीति उत्पन्न होती है ॥ ५९ ॥ ६० ॥
न्यग्रोधाद्यघृत ।
न्यग्रोधाश्वत्थपार्थामृत-वृषकटुकाप्लक्षजम्बूपियालाः
श्योनाकोडुम्बराख्यामधुकतरुबलावेतसं केन्दुनीपौ ।
रोहीतं पीतसारं विधिविहितहृतं सर्वमेषां तरूणां प्रत्येकं
वल्कलं तद्युगपलमखिलं क्षोदयित्वा भिषग्भिः ॥ ६१॥
क्वाथ्यं द्रोणाम्भसा तद्दृढविमलकटाहेऽत्र पादावशेषं
सर्पिः प्रस्थं च पाच्यं पचनकुशलिरा मन्दमन्दानलेन ।
प्रस्थं धात्रीरसानां विधिविहितजलप्रस्थमेकं च शाले-
र्दत्त्वा त्र्यक्षं तु कल्कं मधुकमपि मधोः पुष्पखर्जूरदार्बी ।
जीवन्तीकाश्मरीणां फलमपि युगलं क्षीरकाकोलियुग्मं
रक्ताख्यं चंदनं यत्तदपरममलं चाञ्जनं शारिवा च ॥ ६२॥
वड, पीपल, अर्जुन, गिलोय, अडूसा, कुटकी, पाखर, जामुन, चिरौंजी श्योनाक, गूलर, महुआ, खिरेंटी, बेंत, कुचिला, कदम, रोहेडां और शाल इन समस्त औषधियोंकी छाल पृथक् पृथक् आठ आठ तोले लेकर सबको एकत्र कूटकर ३२ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें घी एक प्रस्थ, आंवलोंका रस एक प्रस्थ विधिपूर्वक बनाया हुआ शालिचावलोंका क्वाथ एक प्रस्थ तथा कल्कके लिये मुलहठी, महुएके फूल, पिण्डखजूर, दारुहल्दी, जीवन्ती, कुम्हेर, काकोली और क्षीरकाकोली इन चारोंके फल, लालचन्दन, सफेद चन्दन, रसौत, अनन्तमूल ये प्रत्येक औषधि तीन तीन तोले लेकर बारीक पीसकर डालदेवे । फिर पचनक्रियामें कुशल वैद्य यथाविधिसे मन्द मन्द अग्निद्वारा घृतको पकावे । जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उसको चिकने बर्त्तनमें भरकर रख-देवे ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
न्यग्रोधाद्यं घृतं ह्येतद्देहं प्राप्यामृतायते ।
दुस्तरं प्रदरं हन्ति नीलं रक्तं सितासितम् ॥ ६३ ॥
योनिशूलं कुक्षिशूलं वस्तिशूलं सुदुःसहम् ।
१२३८ भैषज्यरत्नावली । [ प्रदररोग-
अङ्गदाहं योनिदाहमक्षिकुक्षिभवं च यम् ॥ ६४ ॥
मन्ददृष्टिमश्रुपातं तिमिरं वातसम्भवम् ।
आध्मानानाहशूलघ्नं वातपित्तप्रकोपजित् ॥ ६५ ॥
अम्लपित्तं च पित्तं च योनिरोगं विनाशयेत् ।
दृष्टिप्रसादजननं बलवर्णाग्निकारकम् ॥ ६६ ॥
यह न्यग्रोधाद्यनामक घृत शरीरमें पहुँचकर अमृतके समान गुण करता है । तथा स्त्रियोंके दुस्तर नीलप्रदर, लालप्रदर, श्वेतप्रदर, कृष्णप्रदर, योनिशूल, कुक्षिशूल, दुस्सह वस्तिशूल, अङ्गोंकी दाह, योनिदाह, नेत्रदाह, कुक्षिदाह, दृष्टिकी हीनता, अश्रुपात, वातज तिमिररोग, आध्मान, आनाह ( अफारा ) शूल, वातपित्तजन्य रोग, अम्लपित्त, पित्त और योनिरोगको शीघ्र नष्ट करता है एवं दृष्टिको प्रसन्न, बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि करता है ॥ ६३-६६ ॥
विश्ववल्लभघृत ।
केशराजस्य निर्गुण्ड्याः शतावर्याः कुशस्य च ।
विदार्याः स्वरसेनापि च्छागेन पयसा तथा ॥ ६७ ॥
कल्कैर्दाडिमबिल्वाब्दैर्लवङ्गैलाफलत्रिकैः ।
महता पञ्चमूलेन द्राक्षाचन्दनचम्पकैः ॥ ६८ ॥
निशादारुनिशाभ्यां च वह्निना लवणैरपि ।
तोयपिष्टैः पचेत्सर्पिः पात्रे मृत्परिनिर्मिते ॥
विश्ववल्लभनामेदं घृतं स्त्रीगदसूदनम् ॥ ६९ ॥
कुकुरभाँगरा, निर्गुण्डी, शतावर, कुशा और विदारीकन्द इनके स्वरस तथा बकरीके दूधको एकएक प्रस्थ लेकर सबके साथ अनारका वक्कल, बेलगिरी नागरमोथा, लौंग, इलायची, त्रिफला, बृहत्पञ्चमूल, दाख, लालचंदन, चम्पा वृक्षकी छाल, हल्दी, दारुहल्दी, चीतेकी जड और पाँचोंनमक इन सब औषधियोंको समान भाग मिश्रित एक सेर लेकर जलमें पीसकर यथाविधि मिश्रित करके घृतको पकावे । जब अच्छे प्रकारसे पकजाय तब मिट्टीके उत्तम पात्रमें भरकर रखदेवे । यह विश्ववल्लभनामक घृत स्त्रियोंके सब रोगोंको नष्ट करता है ॥
अशोकघृत ।
अशोकवल्कलं प्रस्थं तोयाढकविपाचितम् ।
पादस्थेन घृतप्रस्थं जीरकक्वाथसंयुतम् ॥ ७० ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३९
तण्डुलाम्बु त्वजाक्षीरं घृततुल्यं प्रदापयेत् ।
तथैव केशराजस्य प्रस्थमेकं भिषग्वरः ॥ ७१ ॥
जीवनीयैः पियालैस्तु परुषैः सरसाञ्जनैः ।
यष्ट्याह्वाशोकमूलं च मृद्वीका च शतावरी ॥ ७२ ॥
तण्डुलीयकमूलं च कल्कैरेभिः पलार्द्धकैः ।
शर्करायाः पलान्यष्टौ सिद्धशीते प्रदापयेत् ॥ ७३ ॥
अशोककी छालको एक प्रस्थ लेकर एक आढक जलमें पकावे। जब पकते हुए चौथाई भाग जल बाकी रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथके साथ घी एक प्रस्थ, जीरेका क्वाथ एक प्रस्थ, चावलोंका जल एक प्रस्थ, बकरीका दूध एक प्रस्थ और कुकुरभाँगरेका रस एक प्रस्थ तथा जीवनीयगणकी औषधियें, चिरौंजी, फालसे, रसौत, मुलहठी, अशोककी जडकी छाल, दाख शतावर और चौलाईकी जड इन सब औषधियोंके दो दो तोले कल्कको मिलाकर यथारीति घृत को पकावे । जब अच्छे प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें ८ पल चीनी मिलादेवे ॥ ७०-७३ ॥
पीतमेतद् घृतं हन्ति सर्वदोषसमुद्भवम् ।
श्वेतं नीलं तथा कृष्णं प्रदरं हन्ति दुस्तरम् ॥ ७४ ॥
कुक्षिशूलं कटीशूलं योनिशूलं च सर्वगम् ।
मन्दाग्निमरुचिं पाण्डुं कृशतां श्वासकासकम् ॥ ७५ ॥
आयुःपुष्टिकरं बल्यं बलवर्णप्रसादनम् ।
देयमेतत्परं सर्पिर्विष्णुना परिकीर्त्तितम् ॥ ७६ ॥
इस घृतको पीतेही सम्पूर्ण दोषोंसे उत्पन्न हुआ श्वेतप्रदर नीलप्रदर तथा दुस्तर कृष्णप्रदर नष्ट होता है । यह घृत कुक्षिशूल, कटिशूल, सर्व प्रकारके योनिशूल, मन्दाग्नि, अरुचि, पाण्डुरोग कृशता, श्वास, खाँसी प्रभृति विकारोंको नष्ट करता है । एवं आयुवर्धक, पुष्टिकार, बल और वर्णको उत्पन्न करनेवाला है । इस घृतको श्रीविष्णुभगवान्ने रचा है ॥ ७४-७६ ॥
अशोकारिष्ट ।
अशोकस्य तुलामेकां चतुर्द्रोणे जले पचेत् ।
पादशेषे रसे पूते शीते पलशतद्वयम् ॥ ७७ ॥
दद्याद् गुडस्य धातक्याः पलषोडशिकं मतम् ।
अजाजीं मुस्तकं शुण्ठीं दार्वीमुत्पलफलत्रिकम् ॥ ७८ ॥
१२४० भैषज्यरत्नावली । [ योनिव्यापद-
आम्रास्थि जीरकं वासां चन्दनं च विनिक्षिपेत् ।
चूर्णयित्वा पलांशेन ततो भाण्डे निधापयेत् ॥ ७९ ॥
मासादूर्ध्वं च पीत्वैनमसृग्दररुजां जयेत् ।
ज्वरं च रक्तपित्तार्शो मन्दाग्नित्वमरोचकम् ॥
मेहशोथारुचिहरस्त्वशोकारिष्टसंज्ञितः ॥ ८० ॥
अशोककी छालको १०० पल लेकर चार द्रोण ( १२८ सेर ) जलमें पकावे । जब पकते २ एक द्रोण ( ३२ सेर ) जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें शीतल होजानेपर २०० पल गुड, धायके फूल ६४ तोले एवं काला जीरा, नागरमोथा, सोंठ, दारुहल्दी, लालकमलकी जड, त्रिफला, आमकी गुठलीकी गिरी, जीरा, अडूसा और लालचन्दन इन सबको एक एक तोला लेकर और एकत्र कूटपीसकर डालदेवे । फिर उस पात्रके मुखको बन्द करके रखदेवे । एक महीनेके बाद उसको निकालकर और छानकर उपयुक्त मात्रासे दिनमें दो तीन बार पान करे तो यह अशोकारिष्ट सर्व प्रकारके प्रदररोग, ज्वर, रक्तपित्त, बवासीर मन्दाग्नि, अरुचि, प्रमेह, सूजन और इनके अतिरिक्त अन्यान्य सर्व प्रकारके रोगोंको शीघ्र हरता है ॥ ७७-८० ॥
प्रदरमें पथ्यापथ्यविधि ।
यत्पथ्यं यदपथ्यं च रक्तपित्तेषु कीर्त्तितम् ।
प्रदरेऽपि यथादोषं तत्तन्नारी भजेत्त्यजेत् ॥ ८१ ॥
रक्तपित्तरोगमें जो पथ्यपदार्थ वर्णन किये हैं उनको स्त्री प्रदररोगमें दोषानुसार सेवन करे और जो उक्त रोगमें अपथ्य कहे गये हैं उन सबको प्रदररोगमें भी त्यागदेवे ॥ ८१ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां प्रदररोगचिकित्सा ।
योनिव्यापदकी चिकित्सा ।
योनिव्यापत्सु भूयिष्ठं शस्यते कर्म वातजित् ।
वस्त्यभ्यङ्गपरीषेकप्रलेपाः पिचुधारणम् ॥ १ ॥
योनिव्यापद्रोगमें वायुनाशक शीतलक्रिया तथा वस्तिक्रिया, तेलादिकी मालिश, सेचन, प्रलेप और पिचु ( फोया ) धारणादि उपचार करे ॥ १ ॥
चिकित्सा ] . भाषाटीकासहिता । १२४१
वचोपकुञ्चिकाजाजीकृष्णावृषकसैन्धवम् ।
अजमोदां यवक्षारं चित्रकं शर्करान्वितम् ॥ २ ॥
पिष्ट्वा प्रसन्नयाऽऽलोड्य खादेत्तद् घृतभर्जितम् ।
योनिव्यापत्तिहृद्रोगगुल्मार्शोविनिवृत्तये ॥ ३ ॥
वच, कालाजीरा, जीरा, पीपल, अडूसा, सैंधानमक, अजमोद, जवाखार, चीतेकी जड इन सबको समान भाग लेकर बारीक पीसलेवे । फिर उस चूर्णको घीमें भूनकर खाँड और सुराके मंडके साथ मिलाकर भक्षण करे । इससे योनिव्यापद्रोग, हृदयरोग, गुल्म और अर्शादिरोग नष्ट होते हैं ॥ २ ॥ ३ ॥
गुडूचीत्रिफलादन्तीक्वाथैश्च परिषेचनम् ।
नतवार्त्ताकिनीकुष्ठसैन्धवामरदारुभिः ॥
तैलात्प्रसाधिताद्धार्यः पिचुर्योनौ रुजापहः ॥ ४ ॥
गिलोय, त्रिफला और दन्ती इनके क्वाथसे योनिको सिञ्चन करे । एवं तगर बडीकटेरी, कूट, सैंधानमक और देवदारु इन सब औषधियोंके द्वारा तेल पकाकर उसमें फोया भिजोकर योनिमें रक्खे तो योनिव्यापद्रोग दूर होय ॥ ४ ॥
पित्तलानां तु योनीनां सेकाभ्यङ्गपिचुक्रियाः ।
शीताः पित्तहराः कार्याः स्नेहनार्थे घृतानि च ॥ ५ ॥
पित्तलानामक योनिव्यापद्रोगमें योनिपर सेचन, तेलादिकी मालिश, फोया रखना, घृतादि स्नेहद्रव्योंका प्रयोग और पित्तनाशक शीतल क्रिया करे ॥ ५ ॥
योन्यां बलासदुष्टायां सर्वं रूक्षोष्णमौषधम् ।
पिप्पल्या मरिचैर्माषैः शताह्वाकुष्ठसैन्धवैः ॥
वर्त्तिस्तुल्या प्रदेशिन्या धार्या योनिविशोधिनी ॥ ६ ॥
कफजनित योनिव्यापद्रोगमें सर्वप्रकारकी रूखी और गरम औषधियाँ उपयोग करे । पीपल, कालीमिरच, उडद, सोया, कूट, सैंधानोन इन सबको एकत्र पीसकर तर्जनी अंगुलीकी समान बत्ती बनाकर योनिमें रक्खे । यह बत्ती योनिको शुद्ध करती है ॥ ६ ॥
हिंस्राकल्कस्य वातार्त्ता कोष्णमभ्यज्य धारयेत ।
पञ्चवल्कस्य पित्तार्त्ता श्यामादीनां कफोत्तरा ॥ ७ ॥
वातज योनिव्यापद्रोगमें कटेरीकी जडको पीसकर उसकी बत्ती बनाकर कुछ एक गरम करके योनिमें रक्खे । इसीप्रकार पित्तज योनिमें बडादि पाँचों वृक्षोंकी
१२४२ भैषज्यरत्नावली । [ योनिव्यापद्-
छालकी बत्ती और कफज योनिरोगमें श्यामालतादिकी बत्ती बनाकर योनिमें धारण करे तो विशेषोपकार होता है ॥ ७ ॥
मूषिकामांससंयुक्तं तैलमातपभावितम् ।
अभ्यङ्गाद्धन्ति योन्यर्शः स्वेदस्तन्मांससैन्धवैः ॥ ८ ॥
चूहेके मांसको ८ तोले लेकर उसके साथ आध सेर तिलके तेलको धूपमें रखकर ७ दिनतक पकावे । फिर उस तेलको योनिमें मले तो योन्यर्शरोग दूर होता है । एवं चूहेके मांस और सैंधानमकको एक जगह पकाकर अण्डके पत्तेपर रखकर योनिमें स्थापन करके स्वेद प्रदान करे ॥ ८ ॥
गोपित्ते मत्स्यपित्ते वा क्षौमं सप्ताहभावितम् ।
मधुना किण्वचूर्णं वा दद्यादचरणापहम् ॥ ९ ॥
रेशमके टुकडेको गौके पित्तमें अथवा मछलीके पित्तमें ७ दिनतक भावना देकर योनिके मध्यमें प्रवेश करे अथवा सुराबीजके चूर्णको शहदमें मिलाकर योनिमें लगावे तो अचरणानामक योनिरोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥
वामिन्याः पूतियोन्याश्च कर्त्तव्यः स्वेदनोऽपि वा ।
क्रमः कार्य्यस्ततः स्नेहः पिचुभिस्तर्पणं भवेत् ॥
स्रोतसां शोधनं कण्डूक्लेदशोथहरं च तत् ॥ १० ॥
वामिनी और पूतियोनिरोगमें स्वेद देवे और तेलमें भिगोकर रुईका फोया रक्खे । इससे स्रोतोंकी शुद्धि होती है तथा खुजली, क्लेद, सूजन दूर होती है ॥ १० ॥
शल्लकीजिङ्गिनीजम्बूधवतवक्पञ्चपल्लवैः ।
कषायैः साधितः स्नेहः पिचुः स्याद्विप्लुतापहः ॥ ११ ॥
शालईवृक्ष, जिङ्गिनीवृक्ष, जामुन और धौंवृक्ष इनकी छाल एवं आम, जामुन, कैथ, जम्भीरी नींबू और बेंत इनके पत्ते समान भाग लेवे । इन सबके काथके साथ तेल पकाकर उसमें रुईके फोयेको भिगोकर योनिमें रक्खे तो विप्लुतारोग नष्ट होता है ॥ ११ ॥
कर्णिण्यां वर्त्तिका कुष्ठपिप्पल्यार्क्याग्रसैन्धवैः ।
बस्तमूत्रकृता धार्या सर्वं च कफनुद्धितम् ॥ १२ ॥
कर्णिनीरोगमें कूठ, पीपल, आकके पत्ते और सैंधानमक इन सबको बकरीके मूत्रमें पीसकर बत्ती बनाकर उस बत्तीको योनिमें धारण करना और सर्वप्रकारकी कफनाशक चिकित्सा करना हितकारी है ॥ १२ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२४३
त्रैवृत्तं स्नेहनं स्वेद उदावर्त्तानिलार्त्तिषु ।
तदेव च महायोन्यां स्रस्तायां च विधीयते ॥ १३ ॥
उदावर्त्त और वातज योनिरोगमें निसोतके चूर्णको तेलादि स्नेहद्रव्योंके साथ मिलाकर लगावे और स्वेदप्रदान करे । इसीप्रकार महायोनि और स्रस्तायोनिमेंभी क्रिया करना श्रेष्ठ है ॥ १३ ॥
आखोर्मांसं सपदि बहुधा खण्डखण्डीकृतं तत्
तैले पाच्यं भवति नियतं यावदेतन्न सम्यक् ।
तत्तैलाक्तं वमनमनिशं योनिभागे दधाना
हन्ति व्रीडाकरभगफलं नात्र सन्देहबुद्धिः ॥ १४ ॥
चूहेके मांसके टुकडे टुकडे करके उसके द्वारा तिलके तेलको पकावे । उस तेलमें फोयेको भिजोकर योनिमें रखनेसे योनिकन्दरोग नष्ट होता है । इसमें किञ्चिन्मात्रभी सन्देह नहीं है ॥ १४ ॥
शतपुष्पातैललेपात्तुवरीदलजात्तथा ।
पेटिकामूललेपेन योनिर्भिन्ना प्रशाम्यति ॥ १५ ॥
सोयेको तेलमें खरलकर लेप करनेसे अथवा अडहरके पत्तोंको किंवा पेटारिवृक्षकी जडको जलमें पीसकर लेप करनेसे विदीर्णयोनि फिर जुड जाती है ॥
सुषवीमूललेपेन प्रविष्टा तु बहिर्भवेत् ।
योनिर्मूषवसाभ्यङ्गान्निसृता प्रविशेदपि ॥ १६ ॥
करेलेकी जडको पीसकर लेप करनेसे भीतरको प्रविष्टहुई योनि बाहरको निकल आतीहै और चूहेकी चर्बीकी मालिश करनेसे बाहरको निकलीहुई योनि भीतरको प्रवेश करजाती है ॥ १६ ॥
लोध्रतुम्बीफलालेपो योनेर्दाढर्यं करोति च ।
वेतसमूलनिःक्वाथक्षालनेन तथैव च ॥
मूषिकावल्गुलीवसाम्रक्षणं योनिदाढर्यदम् ॥ १७ ॥
लोध और कडवी तोरई इनको बराबर भाग लेकर एकत्र पीसकर योनिमें लेप करे अथवा बेंतकी छालके क्वाथसे योनिको सिञ्चन करे किंवा चूहे या पिडूकी चर्बीको योनिपर मले तो शिथिलयोनि दृढ होजाती है ॥ १७ ॥
वचा नीलोत्पलं कुष्ठं मरिचानि तथैव च ।
अश्वगन्धा हरिद्रा च दृढीकरणमुत्तमम् ॥ १८ ॥
१२४४ भैषज्यरत्नावली । [ योनिव्यापद्-
वच, नीलकमल, कूठ, कालीमिरच, असगन्ध और हल्दी इनको एकत्र पीसकर लेप करनेसेभी योनि दृढ होती है ॥ १८ ॥
पलाशोदुम्बरफलं तिलतैलसमन्वितम्। मधुना योनिमालिप्य दृढीकरणमुत्तमम् ॥ १९ ॥ ढाकके बीज, गूलर, तिलका तेल और शहद इनको पीसकर लेप करना उत्तम दृढीकरणयोग है ॥ १९ ॥
मदनफलमधुकर्पूरप्रपूरितं कामिनीजनस्य । चिरगलितयौवनस्य वराङ्गमतिगाढं सुकुमारम् ॥२०॥ मैनफल, शहद और कपूर इनको एकत्र पीसकर स्त्रियोंकी योनिमें लगानेसे बहुत दिनोंसे शिथिलहुई और यौवनरहित योनि अत्यन्त दृढ, कोमल होतीहै ॥२०॥
पञ्चपल्लवयष्ट्याह्वमालतीकुसुमैर्घृतम् । रविपक्रमन्यथा वा योनिगन्धनिवारणम् ॥ २१ ॥ आम, जामुन, कैथ, जम्बीरीनीम्बू और बेल इनके पत्ते तथा मुलहठी और चमेलीके पत्ते इनके कल्कद्वारा धूपमें अथवा अग्निमें घृतको पकाकर योनिमें मलनेसे योनिकी दुर्गन्ध दूर होती है ॥ २१ ॥
सुतनुं करोति मध्यं पीतं मथितेन माधवीमूलम् ॥ माधवीलताकी जडको जलमें पीसकर पान करनेसे स्त्रियोंके शरीरका मध्यभाग क्षीण होकर सुन्दर शरीर होजाताहै ॥
स्याच्छिथिलापि च दृढा सुरगोपाज्याभ्यङ्गतो योनिः॥२२ वीरबहूटीनामक कीडेको घृतके साथ पीसकर लेप करनेसे शिथिलयोनि दृढ होजातीहै ॥ २२ ॥
वेतसस्य तु मूलानि क्वाथयेन्मृदुनाऽग्निना । भगं प्रक्षालितं तेन गाढत्वमुपजायते ॥ २३ ॥ बेंतकी जडके क्वाथको मन्दमन्द अग्निसे पकाकर उसके द्वारा योनिको सींचे तो योनिमें दृढता उत्पन्न होती है ॥ २३ ॥
रजःप्रवर्त्तक योग।
इक्ष्वाकुबीजदन्तीचपलागुडमदनफलकिण्वयष्ट्याह्वैः । सस्नुक्क्षीरैर्वर्त्तियोंनिगता कुसुमसंजननी ॥ २४ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२४५
कडवी तोरईके बीज, दन्तीकी जड, पीपल, गुड, मैनफल, सुराबीज और मुल- हठी इनके चूर्णको समान भाग लेकर थूहरके दूधमें सबको अच्छेप्रकार खरल करके बत्ती बनालेवे । उस बत्तीको योनिमें रखनेसे ऋतुधर्म उत्पन्न होता है ॥
सकाञ्जिकं जवापुष्पं भृष्टं ज्योतिष्मतीदलम् ।
दूर्वापिष्टं च सम्प्राश्य वनिता त्वार्त्तवं लभेत् ॥ २५ ॥
गुडहलके फूलोंको काँजीमें पीसकर अथवा, मालकाङ्गनीके पत्तोंको काँजीमें भूनकर या केवल दूबको चावलोंके जलद्वारा पीसकर उसके बड़े बनाकर खानेसे स्त्री आर्तव (रजोधर्म) को प्राप्त होती है ॥ २५ ॥
पीतं ज्योतिष्मतीपुष्पस्वर्जिकोत्रासनं त्र्यहम् ।
पीतेन पयसा पिष्टं कुसुमं जनयेद् ध्रुवम् ॥ २६ ॥
मालकाङ्गनीके फूल, सञ्जी, वच और विजयसार इन सबको दूधमें पीसकर तीन दिनतक सेवन करनेसे निश्चय रजोत्पत्ति होती है ॥ २६ ॥
रजःप्रवर्त्तिनीवटी ।
टङ्कणं हिङ्गु कासीसं कन्यासारं समांशकम् ।
कुमारीस्वरसेनैव चणकप्रमिता वटी ॥ २७ ॥
रजरोधं कष्टरजो वेदनाश्च तदुद्भवाः ।
रजःप्रवर्त्तिनी नाम वटी चूर्णं विनाशयेत् ॥
भाषिता नीलकण्ठेन वह्निः काष्ठचयं यथा ॥ २८ ॥
सुहागा, हींग, हीराकासीस और वनककोडा इनको समान भाग लेकर घीग्वारके रसमें खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । इस रजःप्रवर्त्तिनी नाम वटीके सेवन करनेसे अथवा उक्त द्रव्योंके चूर्णको सेवन करनेसे रजका रुकना, कष्टसे रजक होना और उसके द्वारा पीडा होनी दूर होती है । इसको श्रीशिवजीने कहा है । यह वटी जिस प्रकार अग्नि काष्ठके समूहको तत्क्षण नष्ट करदेता है इसी प्रकार रजदोष को तत्काल दूर करदेती है ॥ २७ ॥ २८ ॥
गर्भाजनक-भेषज ।
पिप्पलीविडङ्गतङ्कणसमचूर्णं या पिबेत्पयसा ।
ऋतुसमये न हि तस्या गर्भः सञ्जायते क्वापि ॥ २९ ॥
पीपल वायविडङ्ग और सुहागा इनके चूर्णको समान भाग लेकर दूधमें पीसकर ऋतुकालमें पान करनेसे कदापि गर्भोत्पत्ति नहीं होती ॥ २९ ॥
१२४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ योनिव्यापद-
आरनालपरिपेषितं त्र्यहं या जवाकुसुममत्ति पुष्पिणी ।
सत्पुराणगुडमुष्टिसेविनी सन्दधाति न हि गर्भमङ्गना ३०॥
ऋतुमती स्त्री गुड़हलके फूलोंको काँजीमें पीसकर और पुराने गुड़में मिलाकर तीन दिनतक सेवन करे तो उसके कभी भी गर्भधारण नहीं होता ॥३०॥
पाठापत्रमृतुस्नाता पीत्वा गर्भं न धारयेत् ॥
रजस्वला स्त्री स्नान करके पाठके पत्तोंको जलमें पीसकर पान करे तो गर्भस्थिति नहीं होती ॥
धात्र्यर्जुनाभयाचूर्णं तोयपीतं रजो हरेत् ।
शेलुच्छदमिश्रपिष्टभक्षणं च तदर्थकृत् ॥ ३१ ॥
आमले, अर्जुनकी छाल, और हरड इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको जलके साथ ऋतुकालमें सेवन करनेसे अथवा लहसौडेके पत्तोंको मिलाकर उक्त औषधियोंके बडे बनाकर खानेसे आर्त्तवका होना बन्द होता है और गर्भको धारण करनेकी शक्ति नष्ट होजाती है ॥ ३१ ॥
रसाञ्जनं हेमवतीवयःस्थाचूर्णीकृतं शीतजलेन पीतम् ।
रजोविनाशं नियतं करोति शङ्का च का गर्भसमागमस्य॥
रसौत, हरड और आमले इनको एकत्र पिसकर शीतल जलके साथ पान करनेसे स्त्रियोंके नियमित समयमें होनेवाला ऋतु बन्द होजाता है। फिर गर्भोत्पत्ति होनेकी और सम्भावना क्या है ? ॥ ३२ ॥
नष्टपुष्पान्तकरस ।
रसेन्द्रगन्धकं लौहं वङ्गं सौभाग्यमेव च ।
रजतञ्चाभ्रताम्रं च प्रत्येकं च पलं पलम् ॥ ३३ ॥
गुडूची त्रिफला दन्ती शेफाली कण्टकारिका ।
दारुसैन्धवकुष्ठं च बृहती काकमाचिका ॥ ३४ ॥
नतं तालीशवेत्राग्रं श्वदंष्ट्रा वृषकं बला ।
एतेषां स्वरसैर्भाव्यं त्रिवारं च पृथक् पृथक् ॥ ३५ ॥
जीवन्तीं मधुकं दन्तीं लवङ्गं वंशलोचनम् ।
रास्नां गोक्षुरबीजं च शाणमानं विचूर्णयेत् ॥ ३६ ॥
सर्वमेकीकृतं पेष्यं जयन्तीतुलसीरसैः ।
मर्दयित्वा वटीं कुर्यान्नष्टपुष्पकयोषिते ॥ ३७ ॥
चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२४७
नष्टपुष्पे नष्टशुके योनिशूले च शस्यते । ऋतुकाले क्लेदयोन्यां विशेषे चाममारुते ॥ एतात्रोगान्निहन्त्याशु भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३८ ॥
शुद्धपारा, शुद्धगन्धक, लोहा, वङ्ग, सुहागा, चाँदी, अभ्रक और ताँबा इन प्रत्येक द्रव्यको चार-चार तोले लेकर गिलोय, त्रिफला, दन्तीकी जड, नील सिंहाळु, कटेरी, देवदारु, सेंधानमक, कूठ, बडीकटेरी, मकोय, तगर, तालीशपत्र, बेंतकी कोंपल, गोखुरू, अडूसा और खिरेंटी इन सबके स्वरस अथवा क्वाथमें तीन-तीन बार अलग अलग क्रमपूर्वक भावना देवे । पश्चात् जीवन्ती, मुलहठी, दन्ती, लौंग, बंशलोचन, रास्ना और गोखुरूके बीज इनको चार-चार माशे लेकर चूर्ण करले और सबको एकत्र मिलाकर जयन्ती और तुलसीके रसमें उत्तमप्रकार खरलकर गोलियाँ बनालेवे । फिर इस रसको स्त्रियोंके रजके नष्ट होनेपर, वीर्य्यके नष्ट होजानेपर, योनिशूल, ऋतुकालगत शूल, क्लेदयुक्त योनि और आमवातरोगमें प्रयोग करना चाहिये । यह रस इन समस्त रोगोंको इसप्रकार नष्ट करदेता है जिसप्रकार सूर्य अन्धकारसमूहको ॥ ३३-३८ ॥
फलघृत ।
त्रिफलां द्वे सहचरे गुडूचीं सपुनर्नवाम् । शुकनासां हरिद्रे द्वे रास्नां मेदां शतावरीम् ॥ ३९ ॥ कल्कीकृत्य घृतप्रस्थं पचेत्क्षीरचतुर्गुणम् । तत्सिद्धं प्रपिबेन्नारी योनिशूलनिपीडिता ॥ ४० ॥
त्रिफला, नीलापियाबाँसा, पीलापियाबाँसा, गिलोय, पुनर्नवा, शोनापाठ, हल्दी, दारुहल्दी, रास्ना, मेदा और शतावर ये प्रत्येक दो दो तोले लेकर एकत्र पीसलेवे । फिर उस कल्कके सहयोगसे एक प्रस्थ घृतको चौगुने दूधमें पकावे । जब अच्छे प्रकार सिद्ध होजाय तब उस घृतको योनिशूलसे पीडित स्त्री पान करे ॥ ३९॥४० ॥
पिण्डिता चलिता या च निःसृता विवृता च या । पित्तयोनिश्च विस्रस्ता षण्ढयोनिश्च या स्मृता ॥ ४१ ॥ प्रपद्यन्ते तु ताः स्थानं गर्भं गृह्णन्ति चासकृत् । एतत्फलघृतं नाम योनिदोषहरं परम् ॥ ४२ ॥
इससे पिण्डाकार, चलायमान, बाहरको निकली हुई, भीतरको प्रविष्टहुई योनि, पित्तजयोनि, विस्रस्ता और षण्ढयोनि ये सर्वप्रकारकी योनियें यथास्थानको
१२४८ | भैषज्यरत्नावली । | [ योनिव्यापद्-
प्राप्त होती हैं और गर्भको शीघ्र धारण करती हैं। यह फलघृत अल्पकालमेंही सर्वप्रकारके योनिके दोषोंको हरण करता है ॥ ४१ ॥ ४२ ॥
फलकल्याणघृत ।
मञ्जिष्ठा मधुकं कुष्ठं त्रिफला शर्करा बला ।
मेदा पयस्या काकोली मूलं चैवाश्वगन्धजम् ॥ ४३ ॥
अजमोदा हरिद्रे द्वे हिङ्गुः कटुकरोहिणी ।
उत्पलं कुमुदं द्राक्षा काकोल्यौ चन्दनद्वयम् ॥ ४४ ॥
एतेषां कार्षिकैर्भागैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ।
शतावरीरसं क्षीरं घृताद्देयं चतुर्गुणम् ॥ ४५ ॥
मंजीठ, मुलहठी, कूट, त्रिफला, चीनी, खिरेंटी, मेदा, क्षीरकाकोली, काकोली, असगन्धकी जड, अजमोद, हल्दी, दारुहल्दी, हींग, कुटकी, लालकमल, बबुला, दाख, क्षीरकाकोली, काकोली, श्वेतचंदन, रक्तचन्दन और लक्ष्मणाकी जड अभावमें सफेद कटेरीकी जड ) इन सब औषधियोंको दो दो तोले लेकर एकत्र कूट पीसकर चूर्ण करलेवे । फिर घी १ प्रस्थ, शतावरका रस और दूध ४-४ प्रस्थ लेवे, सबको यथाविधि मिलाकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे ॥४३-४५॥
सर्पिरेतन्नरः पीत्वा नित्यं स्त्रीषु वृषायते ।
पुत्रान्संजनयेन्नारी मेधाढ्यान्प्रियदर्शनान् ॥ ४६ ॥
या चैवास्थिरगर्भा स्याद्या च वा जनयेन्मृतम् ।
अल्पायुषं वा जनयेद्या च कन्यां प्रसूयते ॥ ४७ ॥
योनिदोषे रजोदोषे परिस्रावे च शस्यते ।
प्रजावर्द्धनमायुष्यं सर्वग्रहनिवारणम् ॥ ४८ ॥
नाम्ना फलघृतं ह्येतदश्विभ्यां परिकीर्तितम् ॥ ४९ ॥
“अनुक्तं लक्ष्मणामूलं क्षिपन्त्यत्र चिकित्सकाः ।
जीवद्वत्सैकवर्णाया घृतमत्र तु गृह्यते ॥
आरण्यगोमयेनापि वह्निज्वाला प्रदीयते ॥ ५० ॥”
पुरुष इस घृतको पान करके प्रतिदिन स्त्रियोंमें वृषभके समान रमण करता है और स्त्री इस घृतको पान करे तो मेधावी और प्रियदर्शन पुत्रोंको उत्पन्न करती है। जो स्त्री अस्थिरगर्भा हो और जिसके मृत या अल्पायुवाली संतान