भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३३
एषां कोलमितं चूर्णं द्विगुणा सितशर्करा ।
वरीरसस्य प्रस्थार्द्धे पचेन्मन्देन वह्निना ॥ ३५ ॥
घनीभूते क्षिपेच्चूर्णं शीतीभूते पलं मधु ।
मधुकाद्यवलेहोऽयं महादेवेन भाषितः ॥ ३६ ॥
मुलहठी, लालचन्दन, लाख, लालकमल, रसौत, कुशमूल, वीरणमूल, वलिआरंकी जड, अडूसेकी मूल, बेरकी गुठलीकी मींग, नागरमोथा, बेलगिरी, मोचरस, दारुहल्दी, धायके फूल, अशोकवृक्षकी छाल, दाख, गुड़हलके फूलकी कली, आम और जामुनके कोमल पत्ते, कमलपत्र, शतावर, विदारीकन्द, रौप्यभस्म, लोहभस्म और अभ्रकभस्म इनके चूर्ण को दोदो तोले और सब चूर्णसे दुगुनी मिश्री लेवे । प्रथम मिश्रीको शतावरके एक प्रस्थ रसमें डालकर मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब पकते पकते पाक गाढा होजाय तब उसमें उपर्युक्त औषधियोंका चूर्ण डाले, फिर शीतल होजानेपर चार तोले शहद डालकर सबको एकमएक करलेवे । श्रीम-हादेवजीने इस मधुकाद्यवलेहको कथन किया है ॥ ३२-३६ ॥
दुस्तरं प्रदरं हन्ति नानावर्णं सवेदनम् ।
योनिशूलं कुक्षिशूलं बस्तिशूलं सुदुःसहम् ॥ ३७ ॥
रक्तातिसारं रक्तार्शो रक्तपित्तं चिरोद्भवम् ।
मूत्ररोगानशेषांश्च दाहं मोहं वमिं भ्रमिम् ॥
नाशयेन्नात्र सन्देहो भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ३८ ॥
यह अवलेह दुस्तर और वेदनायुक्त विविधप्रकारके प्रदर, योनिशूल, कुक्षिशूल, दुस्सह बस्तिशूल, रक्तातीसार, रक्तार्श, पुराने रक्तपित्त, मूत्रके समस्त विकार, दाह, मोह वमन और भ्रमादि सर्वप्रकारके रोगोंको इस प्रकार नष्ट कर देता है, जिस प्रकार सूर्य अन्धकारको दूर करता है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥
प्रदरान्तकरस ।
शुद्धसूतं तथा गन्धं शुद्धवङ्गरूप्यकम् ।
खर्परं च वराटं च शाणमानं पृथक्पृथक् ॥ ३९ ॥
त्रितोलक मितं चैव लौहचूर्णं क्षिपेत्सुधीः ।
कन्यानीरेण संमर्द्य दिनमेकं भिषग्वरः ॥
असाध्यं प्रदरं हन्ति भक्षणात्रात्र संशयः ॥ ४० ॥
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