भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२३४ भैषज्यरत्नावली । [ प्रदररोग
शुद्ध पारा, शुद्ध गन्धक, शुद्ध वङ्गभस्म, रौप्यभस्म, खपरियाभस्म और कौडीकी भस्म इन सबको अलग अलग चार चार माशे और लोहेका चूर्ण तीन तोले लेवे । फिर सबको एकत्रकर घग्वारके रसके साथ एक दिनपर्यन्त खरल करके दोदो रत्तीकी गोलियां बनालेवे । इस रसको सेवन करनेसे सर्वप्रकारका असाध्य प्रदररोग भी सन्देहरहित नष्ट होता है ॥ ३९ ॥ ४० ॥
प्रदरारिलौह !
वत्सकस्य तुलां सम्यग् जलद्रोणे विपाचयेत् । अष्टभागावशिष्टं च कषायमवतारयेत् ॥ ४१ ॥ वस्त्रपूते घनीभूते द्रव्याणीमानि दापयेत् । समङ्गा शाल्मलं पाठा बिल्वं मुस्तं च धातकी ॥ ४२ ॥ अरुणा व्योमकं लोहं प्रत्येकं च पलं पलम् । कोलमात्रं प्रयुञ्जीत कुशमूलं पयो ह्यनु ॥ ४३ ॥ श्वेतं रक्तं तथा नीलं पीतं प्रदर दुस्तरम् । कुक्षिशूलं कटीशूलं देहशूलं च सर्वगम् ॥ ४४ ॥ प्रदरारिरयं लौहो हन्ति रोगान्सुदुस्तरान् । आयुःपुत्रकरश्चैव बलवर्णाग्निवर्द्धनः ॥ ४५ ॥
कुडेकी छालको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते अष्टमांश जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छानलेवे । फिर उस क्वाथको दुबारा चूल्हेपर रखकर पकावे । जब पाक गाढा होजाय तब उसमें वराहक्रान्ता, मोचरस, पाठ, बलगिरी, नागरमोथा, धायके फूल, अतीस, अभ्रक और लोहा इन औषधियोंको चार चार तोले लेकर बारीक पीसकर डालदेवे और सबको एकमएक करदेवे । इसको एक तोला प्रमाण लेकर कुशाकी जडको जलमें पीसकर उस जलके साथ सेवन करे तो यह प्रदरारिलोह श्वेत, लाल, नीले और पीले दुस्तर प्रदरको तथा कुक्षिशूल, कटिशूल, सर्व शरीरगत शूल, इनके अतिरिक्त अन्यान्य दुस्तर रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं आयु, बल, वर्ण और अग्निकी वृद्धि करता है तथा पुत्रको उत्पन्न करता है ॥ ४१-४५ ॥
सर्वाङ्गसुन्दररस ।
गगनं शोधितं ग्राह्यं पलैकमिष्टकासमम् । टङ्कणं स्याच्चतुर्थांशं शाणार्द्धं त्रिसुगन्धिकम् ॥ ४६ ॥