भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1275

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२४३

त्रैवृत्तं स्नेहनं स्वेद उदावर्त्तानिलार्त्तिषु ।
तदेव च महायोन्यां स्रस्तायां च विधीयते ॥ १३ ॥
उदावर्त्त और वातज योनिरोगमें निसोतके चूर्णको तेलादि स्नेहद्रव्योंके साथ मिलाकर लगावे और स्वेदप्रदान करे । इसीप्रकार महायोनि और स्रस्तायोनिमेंभी क्रिया करना श्रेष्ठ है ॥ १३ ॥

आखोर्मांसं सपदि बहुधा खण्डखण्डीकृतं तत्
तैले पाच्यं भवति नियतं यावदेतन्न सम्यक् ।
तत्तैलाक्तं वमनमनिशं योनिभागे दधाना
हन्ति व्रीडाकरभगफलं नात्र सन्देहबुद्धिः ॥ १४ ॥
चूहेके मांसके टुकडे टुकडे करके उसके द्वारा तिलके तेलको पकावे । उस तेलमें फोयेको भिजोकर योनिमें रखनेसे योनिकन्दरोग नष्ट होता है । इसमें किञ्चिन्मात्रभी सन्देह नहीं है ॥ १४ ॥

शतपुष्पातैललेपात्तुवरीदलजात्तथा ।
पेटिकामूललेपेन योनिर्भिन्ना प्रशाम्यति ॥ १५ ॥
सोयेको तेलमें खरलकर लेप करनेसे अथवा अडहरके पत्तोंको किंवा पेटारिवृक्षकी जडको जलमें पीसकर लेप करनेसे विदीर्णयोनि फिर जुड जाती है ॥

सुषवीमूललेपेन प्रविष्टा तु बहिर्भवेत् ।
योनिर्मूषवसाभ्यङ्गान्निसृता प्रविशेदपि ॥ १६ ॥
करेलेकी जडको पीसकर लेप करनेसे भीतरको प्रविष्टहुई योनि बाहरको निकल आतीहै और चूहेकी चर्बीकी मालिश करनेसे बाहरको निकलीहुई योनि भीतरको प्रवेश करजाती है ॥ १६ ॥

लोध्रतुम्बीफलालेपो योनेर्दाढर्यं करोति च ।
वेतसमूलनिःक्वाथक्षालनेन तथैव च ॥
मूषिकावल्गुलीवसाम्रक्षणं योनिदाढर्यदम् ॥ १७ ॥
लोध और कडवी तोरई इनको बराबर भाग लेकर एकत्र पीसकर योनिमें लेप करे अथवा बेंतकी छालके क्वाथसे योनिको सिञ्चन करे किंवा चूहे या पिडूकी चर्बीको योनिपर मले तो शिथिलयोनि दृढ होजाती है ॥ १७ ॥

वचा नीलोत्पलं कुष्ठं मरिचानि तथैव च ।
अश्वगन्धा हरिद्रा च दृढीकरणमुत्तमम् ॥ १८ ॥

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