भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1274

१२४२ भैषज्यरत्नावली । [ योनिव्यापद्-

छालकी बत्ती और कफज योनिरोगमें श्यामालतादिकी बत्ती बनाकर योनिमें धारण करे तो विशेषोपकार होता है ॥ ७ ॥

मूषिकामांससंयुक्तं तैलमातपभावितम् ।
अभ्यङ्गाद्धन्ति योन्यर्शः स्वेदस्तन्मांससैन्धवैः ॥ ८ ॥

चूहेके मांसको ८ तोले लेकर उसके साथ आध सेर तिलके तेलको धूपमें रखकर ७ दिनतक पकावे । फिर उस तेलको योनिमें मले तो योन्यर्शरोग दूर होता है । एवं चूहेके मांस और सैंधानमकको एक जगह पकाकर अण्डके पत्तेपर रखकर योनिमें स्थापन करके स्वेद प्रदान करे ॥ ८ ॥

गोपित्ते मत्स्यपित्ते वा क्षौमं सप्ताहभावितम् ।
मधुना किण्वचूर्णं वा दद्यादचरणापहम् ॥ ९ ॥

रेशमके टुकडेको गौके पित्तमें अथवा मछलीके पित्तमें ७ दिनतक भावना देकर योनिके मध्यमें प्रवेश करे अथवा सुराबीजके चूर्णको शहदमें मिलाकर योनिमें लगावे तो अचरणानामक योनिरोग नष्ट होता है ॥ ९ ॥

वामिन्याः पूतियोन्याश्च कर्त्तव्यः स्वेदनोऽपि वा ।
क्रमः कार्य्यस्ततः स्नेहः पिचुभिस्तर्पणं भवेत् ॥
स्रोतसां शोधनं कण्डूक्लेदशोथहरं च तत् ॥ १० ॥

वामिनी और पूतियोनिरोगमें स्वेद देवे और तेलमें भिगोकर रुईका फोया रक्खे । इससे स्रोतोंकी शुद्धि होती है तथा खुजली, क्लेद, सूजन दूर होती है ॥ १० ॥

शल्लकीजिङ्गिनीजम्बूधवतवक्पञ्चपल्लवैः ।
कषायैः साधितः स्नेहः पिचुः स्याद्विप्लुतापहः ॥ ११ ॥

शालईवृक्ष, जिङ्गिनीवृक्ष, जामुन और धौंवृक्ष इनकी छाल एवं आम, जामुन, कैथ, जम्भीरी नींबू और बेंत इनके पत्ते समान भाग लेवे । इन सबके काथके साथ तेल पकाकर उसमें रुईके फोयेको भिगोकर योनिमें रक्खे तो विप्लुतारोग नष्ट होता है ॥ ११ ॥

कर्णिण्यां वर्त्तिका कुष्ठपिप्पल्यार्क्याग्रसैन्धवैः ।
बस्तमूत्रकृता धार्या सर्वं च कफनुद्धितम् ॥ १२ ॥

कर्णिनीरोगमें कूठ, पीपल, आकके पत्ते और सैंधानमक इन सबको बकरीके मूत्रमें पीसकर बत्ती बनाकर उस बत्तीको योनिमें धारण करना और सर्वप्रकारकी कफनाशक चिकित्सा करना हितकारी है ॥ १२ ॥