भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1276

१२४४ भैषज्यरत्नावली । [ योनिव्यापद्-

वच, नीलकमल, कूठ, कालीमिरच, असगन्ध और हल्दी इनको एकत्र पीसकर लेप करनेसेभी योनि दृढ होती है ॥ १८ ॥

पलाशोदुम्बरफलं तिलतैलसमन्वितम्। मधुना योनिमालिप्य दृढीकरणमुत्तमम् ॥ १९ ॥ ढाकके बीज, गूलर, तिलका तेल और शहद इनको पीसकर लेप करना उत्तम दृढीकरणयोग है ॥ १९ ॥

मदनफलमधुकर्पूरप्रपूरितं कामिनीजनस्य । चिरगलितयौवनस्य वराङ्गमतिगाढं सुकुमारम् ॥२०॥ मैनफल, शहद और कपूर इनको एकत्र पीसकर स्त्रियोंकी योनिमें लगानेसे बहुत दिनोंसे शिथिलहुई और यौवनरहित योनि अत्यन्त दृढ, कोमल होतीहै ॥२०॥

पञ्चपल्लवयष्ट्याह्वमालतीकुसुमैर्घृतम् । रविपक्रमन्यथा वा योनिगन्धनिवारणम् ॥ २१ ॥ आम, जामुन, कैथ, जम्बीरीनीम्बू और बेल इनके पत्ते तथा मुलहठी और चमेलीके पत्ते इनके कल्कद्वारा धूपमें अथवा अग्निमें घृतको पकाकर योनिमें मलनेसे योनिकी दुर्गन्ध दूर होती है ॥ २१ ॥

सुतनुं करोति मध्यं पीतं मथितेन माधवीमूलम् ॥ माधवीलताकी जडको जलमें पीसकर पान करनेसे स्त्रियोंके शरीरका मध्यभाग क्षीण होकर सुन्दर शरीर होजाताहै ॥

स्याच्छिथिलापि च दृढा सुरगोपाज्याभ्यङ्गतो योनिः॥२२ वीरबहूटीनामक कीडेको घृतके साथ पीसकर लेप करनेसे शिथिलयोनि दृढ होजातीहै ॥ २२ ॥

वेतसस्य तु मूलानि क्वाथयेन्मृदुनाऽग्निना । भगं प्रक्षालितं तेन गाढत्वमुपजायते ॥ २३ ॥ बेंतकी जडके क्वाथको मन्दमन्द अग्निसे पकाकर उसके द्वारा योनिको सींचे तो योनिमें दृढता उत्पन्न होती है ॥ २३ ॥

रजःप्रवर्त्तक योग।

इक्ष्वाकुबीजदन्तीचपलागुडमदनफलकिण्वयष्ट्याह्वैः । सस्नुक्क्षीरैर्वर्त्तियोंनिगता कुसुमसंजननी ॥ २४ ॥

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