भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२३७


करना परमोपयोगी है । जो तरुणी स्त्री अल्प पुष्पवाली होती है और गर्भको धारण नहीं करती उसके इस घृतके प्रभावसे अवश्य गर्भधारण होता है । इससे स्त्रियोंकी दिनप्रतिदिन प्रीति उत्पन्न होती है ॥ ५९ ॥ ६० ॥

न्यग्रोधाद्यघृत ।

न्यग्रोधाश्वत्थपार्थामृत-वृषकटुकाप्लक्षजम्बूपियालाः
श्योनाकोडुम्बराख्यामधुकतरुबलावेतसं केन्दुनीपौ ।
रोहीतं पीतसारं विधिविहितहृतं सर्वमेषां तरूणां प्रत्येकं
वल्कलं तद्युगपलमखिलं क्षोदयित्वा भिषग्भिः ॥ ६१॥
क्वाथ्यं द्रोणाम्भसा तद्दृढविमलकटाहेऽत्र पादावशेषं
सर्पिः प्रस्थं च पाच्यं पचनकुशलिरा मन्दमन्दानलेन ।
प्रस्थं धात्रीरसानां विधिविहितजलप्रस्थमेकं च शाले-
र्दत्त्वा त्र्यक्षं तु कल्कं मधुकमपि मधोः पुष्पखर्जूरदार्बी ।
जीवन्तीकाश्मरीणां फलमपि युगलं क्षीरकाकोलियुग्मं
रक्ताख्यं चंदनं यत्तदपरममलं चाञ्जनं शारिवा च ॥ ६२॥

वड, पीपल, अर्जुन, गिलोय, अडूसा, कुटकी, पाखर, जामुन, चिरौंजी श्योनाक, गूलर, महुआ, खिरेंटी, बेंत, कुचिला, कदम, रोहेडां और शाल इन समस्त औषधियोंकी छाल पृथक् पृथक् आठ आठ तोले लेकर सबको एकत्र कूटकर ३२ सेर जलमें पकावे । जब पकते पकते चतुर्थांश जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें घी एक प्रस्थ, आंवलोंका रस एक प्रस्थ विधिपूर्वक बनाया हुआ शालिचावलोंका क्वाथ एक प्रस्थ तथा कल्कके लिये मुलहठी, महुएके फूल, पिण्डखजूर, दारुहल्दी, जीवन्ती, कुम्हेर, काकोली और क्षीरकाकोली इन चारोंके फल, लालचन्दन, सफेद चन्दन, रसौत, अनन्तमूल ये प्रत्येक औषधि तीन तीन तोले लेकर बारीक पीसकर डालदेवे । फिर पचनक्रियामें कुशल वैद्य यथाविधिसे मन्द मन्द अग्निद्वारा घृतको पकावे । जब उत्तम प्रकार पककर सिद्ध होजाय तब उसको चिकने बर्त्तनमें भरकर रख-देवे ॥ ६१ ॥ ६२ ॥

न्यग्रोधाद्यं घृतं ह्येतद्देहं प्राप्यामृतायते ।
दुस्तरं प्रदरं हन्ति नीलं रक्तं सितासितम् ॥ ६३ ॥
योनिशूलं कुक्षिशूलं वस्तिशूलं सुदुःसहम् ।