भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२३६ | भैषज्यरत्नावली। | [प्रदररोग- |
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एकैकां च प्रयुञ्जीत प्रातराशं बलाम्बुना ।
उष्णेन पयसा वापि केशराजरसेन वा ॥ ५३ ॥
इयं रत्नप्रभानाम्नी वटिका सर्वसिद्धिदा ।
सर्वस्त्रीरोगहन्त्री च बल्या वृष्या रसायनी ॥ ५४ ॥
इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक गोलीको खिरैंटीके क्वाथ अथवा कुकुरभाँगरेके रस किम्वा मन्दोष्ण दूधके साथ सेवन करे । यह रत्नप्रभानामवाली वटी सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली और स्त्रियोंके समस्त रोगोंको हरनेवाली तथा बलकारक, पुष्टिकारक और रसायन है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥
सितकल्याणघृत ।
कुमुदं पद्मकोशीरं गोधूमं रक्तशालयः ।
मुद्गपर्णी पयस्या च काश्मरी मधुयष्टिका ॥ ५५ ॥
बलातिबलयोर्मूलमुत्पलं तालमस्तकम् ।
विदारी शतपुत्री च शालपर्णी सजीरका ॥ ५६ ॥
फलं त्रपुषबीजानि प्रत्यग्रं कदलीफलम् ।
एषामर्द्धपलान्भागान् गव्यक्षीरं चतुर्गुणम् ॥ ५७ ॥
पानीयं द्विगुणं दत्त्वा घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ५८ ॥
कमोदनीके फूल, पद्माख, खस, गेहूं, लाल शालिचावल, मुगवन, क्षीर काकोली, कुम्मेर, मुलहठी, खिरेंटी, कंघीकी जड, लालकमल, ताडका मस्तक, विदारीकन्द, शतावर, शालपर्णी, जीरा, त्रिफला, ककडीके बीज और कच्ची केलेकी फली इन सबको दो दो तोले लेकर एकत्र कूटपीसकर कल्क बनाले, फिर घृतसे चौगुना गोदुग्ध, दुगुना पानी और एक प्रस्थ घी लेवे, सबको यथाविधि एकत्र मिलाकर उत्तम प्रकारसे घृतको सिद्ध करना चाहिये ॥ ५५-५८ ॥
प्रदरे रक्तगुल्मे च रक्तपित्ते हलीमके ।
बहुरूपं च यत्पित्तं कामलायां च शोणिते ॥
अरोचके ज्वरे जीर्णे पाण्डुरोगे मदे भ्रमे ॥ ५९ ॥
तरुणी चाल्पपुष्पा च या च गर्भं न विन्दति ।
अहन्यहनि च स्त्रीणां भवति प्रीतिवर्द्धनम् ॥ ६० ॥
यह घृत प्रदर, रक्तगुल्म, रक्तपित्त, हलीमक, अनेक प्रकारके पित्तरोग, कामला, रक्तस्राव, अरुचि, जीर्णज्वर, पाण्डुरोग, मद और भ्रमादि रोगोंमें सेवन