भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ९५
तिलप्रमाणं दातव्यं नवज्वरविनाशनम् । उद्वेगे मस्तके तैलं तक्रं चापि प्रदापयेत् ॥ अनुपानं चार्द्ररसः प्रचण्डेश्वरसंज्ञकः ॥ ४६ ॥
शुद्ध विष एक भाग, शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धककी कज्जली दो भाग लेकर सबको दो प्रहरतक खरल करे फिर निर्गुण्डीके पत्तोंके रसमें २१ बार भावना देकर तिलकी बराबर गोलियाँ बनालेवे। इस रसको सेवन करनेसे नवीनज्वर दूर होता है। इसके सेवन करनेपर यदि शरीरमें गरमी मालूम हो तो शिरपर सुगन्धित तेलकी मालिश करनी चाहिये और तक्रपान करना चाहिये। इसपर अदरखके रसका अनुपान करे। इसको प्रचण्डेश्वर रस कहते हैं ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
वैद्यनाथवटी।
शाणं गन्धमथो रसस्य च तथा कृत्वा द्वयोः कज्जलीं तिक्ताचूर्णमथाक्षमेव सकलं रौद्रे त्रिधा भावयेत् । पश्चात्तु सुषवीरसेन न तु वा क्वाथेऽमले त्रैफले ॥ सशोष्य गुटिका कलायसदृशी कार्या बुधैर्यत्नतः ॥४७॥ ज्ञात्वा दोषबलं रसेन सुषवीपत्रस्य पर्णस्य वा । एकद्वित्रिचतुः क्रमेण वटिकां दद्यात्कदुष्णाम्बुना ॥४८॥ हन्ति शूलनिचयं नवज्वरं पाण्डुतामरुचिशोथसंचयम् । रेचने च दधिभक्तभोजनं वैद्यनाथसुकुमाररेचनम् ॥ ४९ ॥
शुद्धगन्धक ४ माशे और शुद्ध पारा ४ माशे लेकर दोनोंकी कजली बना लेवे। उसमें दो तोले कुटकीका और बहेडेका चूर्ण मिलाकर करेलेक पत्तोंके रसमें अथवा त्रिफलेके काढेमें धूपमें रखके तीनवार भावना देवे। फिर सुखाकर मटरके बराबर गोलियाँ बनालेवे। रोगीके दोषोंका बलाबल विचारकर इनमेंसे एकसे चारतक गोली करेलेके पत्तोंके रसके साथ अथवा पानके रसके साथ देवे और उष्णजलका अनुपान करावे। यह वटी सब प्रकारके शूलरोग, नवीनज्वर, पाण्डुरोग, अरुचि और शोथको नष्ट करता है। इन गोलियोंके खानेपर जब विरेचन होजाय तब दही और भातका भोजन करना चाहिये यह श्रीवैद्यनाथजीका कहाहुआ मृदुविरेचन है ॥ ४७-४९ ॥
अग्निकुमाररस ।
मरिचोग्राकुष्ठमुस्तैः सर्वैरेव समं विषम् । पिष्ट्वा चार्द्ररसेनैव वटिका रक्तिकामिता ॥५०॥