भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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( ९४ )भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

करनेसे अजीर्णजनित ज्वर तथा कालाजीरा और गुडमें मिलाकर खानेसे विषम-ज्वर दूर होता है । अत्यन्त भयंकर जीर्णज्वरमें पूर्णवयस्क पुरुषको इस रसकी पूर्णमात्रा देनी चाहिये । इसकी पूर्णमात्रा ४ गोलियोंकी है । किन्तु अत्यन्त क्षीणशरीरवाले, अत्यन्त वृद्ध अवस्थावाले व्यक्तियों और बहुत छोटे वालकोंको इसकी चौथाई मात्रा एक गोली देनी चाहिये या उससे भी कम मात्रा । इस रसको नवीन ज्वरमें सेवन करानेसे एक प्रहरमें ही ज्वर नष्ट होजाता है । यदि रोगी क्षीण न हो और उसके कफकी अधिकता न हो तथा दाहयुक्त वातपैत्तिक ज्वर हो तो नारियलके जलमें मिश्री मिलाकर पिलाना । यह मृत्युञ्जयनामक रस सब प्रकारके ज्वरोंको हरनेवाला है और अनुपानभेदसे सम्पूर्ण रोगोंको नाश करता है ॥ ३७-४२ ॥

श्रीरामरस ।

गन्धकं पारदं तुल्यं मरिचं च त्रिभिः समम् ।
बीजं नैकुम्भकं मर्द्यं दन्तीक्वाथेन यामकम् ॥
द्विगुञ्जः शूलविष्टम्भानिलमामज्वरं जयेत् ॥ ४३ ॥

शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारा और मिरच ये प्रत्येक एक एक भाग और जमालगोटे ३ भाग लेकर सबको एकत्र करके दन्तीकी जडके काढेके साथ एक प्रहरतक खरल करे, फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे । यह रस सेवन करते ही शूलरोग, विष्टम्भवात और आमयुक्त ज्वरको दूर करता है ॥ ४३ ॥

नवज्वरांकुश ।

क्रमेण वृद्धान् रसगन्धहिङ्गुलान्
नैकुम्भबीजान्यथ दन्तिवारिणा ।
पिष्ट्वाऽस्य गुञ्जाऽभिनवज्वरापहा
जलेन सार्द्धं सितया प्रयोजिता ॥ ४४ ॥

पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, सिंगरफ ३ भाग और जमालगोटे ४ भाग लेकर इन सबको दन्तीकी जडके काढेके साथ घोटकर एक एक रत्तीकी गोलियाँ बनाकर रखलेवे । प्रतिदिन एक गोली मिश्रीमें मिलाकर खाय और ऊपरसे जलका अनुपान करे तो नवीनज्वर नष्ट होता है ॥ ४४ ॥

प्रचण्डेश्वर ।

अमृतं पारदं गन्धं मर्दयेत्प्रहरद्वयम् ।
सिन्दुवाररसैः पश्चात् भावयेदेकविंशतिम् ॥ ४५ ॥