भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1286
१२५४भैषज्यरत्नावली।[लोमशातन-

पलाशभस्मान्विततालमूलै रम्भाम्बुमिश्रैरुपलिप्य भूयः।
कन्दर्पगेहे मृगलोचनानां रोमाणि रोहन्ति कदापि नैव ४
ढाककी छालकी भस्म और हरिताल इन दोनोंको बराबर भाग लेकर केलेकीं जडके रसमें पीसकर लेप करनेसे स्त्रियोंकी योनिपर कभी भी रोम उत्पन्न नहीं होतें हैं ॥ ४ ॥

एकः प्रदेयो हरितालभागः पञ्चप्रदेया जलजस्य भागाः ।
रक्षस्तरोर्भस्मन एव पञ्च प्रोक्ताश्च भागाः कदली-
जलाद्रीः ॥ ५ ॥ संमिश्र्य पात्रे मुनि (सप्त) घस्रमात्रं
कृत्वा स्मरागारविलेपनं च । रोमाणि सर्वाणि विला-
सिनीनां पुनर्न रोहन्ति कदाचिदेव ॥ ६ ॥
हरिताल १ भाग, शंखभस्म ५ भाग और ढाककी छालकी भस्म ५ भाग इन सबको यथाविधि लेकर केलेके रसमें एकत्र खरल करके किसी बर्त्तनमें भरकर ७ दिनतक रक्खा रहनेदेवे । रोमस्थानपर उसका लेप करे तो विलासिनी स्त्रियोंकें बाल गिरजाते हैं। फिर आजन्म कदापि बाल उत्पन्न नहीं होते ॥५॥६॥

रम्भाजले सप्तदिनं विभाव्य भस्मानि कम्बोरमसृणानि
पश्चात् । तालेन युक्तानि विलेपनेन लोमानि निर्मू-
लयति क्षणेन ॥ ७॥
शंखभस्म और हरितालको समान भाग ले केलेके रसमें सात दिनतक भावना देकर फिर उसका लेप करे तो क्षणमात्रमेंही सब बाल निर्मूल होजाते हैं ॥ ७ ॥

कुसुम्भतैलाभ्यङ्गो वा रोम्णामुत्पाटकोऽन्तकृत् ॥
कुसुम्भ (कसूम) के तेलकी मालिश करनेसे रोमकूप नष्ट होते हैं ॥

कर्पूरभल्लातकशङ्खचूर्णं क्षारो यवानां च मनःशिला च ।
तैलं सुपक्वं हरितालमिश्रं रोमाणि निर्मूलयति क्षणेन ॥८॥
कपूर, भिलावे, शंखभस्म, जवाखार और मैनासिल इन सबके चतुर्थांश कल्कद्वारा ३ सेर कडवे तेलको पकाकर उसमें हरितालका चूर्ण मिश्रित करलेवे । फिर उस तेलका लेप करे तो तत्क्षण समस्त रोम समूल नष्ट होजाते हैं ॥८॥

आरग्वधाद्यतैल ।

आरग्वधमूलपलं कर्षद्वितयं शंखचूर्णस्य ।
हरितालस्य च मूखरजत्रप्रस्थेन कटुतैलम् ॥ ९.॥