भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२५५

पक्वं तैलं तदथ शंखहरीतालचूर्णितं लेपात् ।
निर्मूलयति रोमाण्यन्येषां सम्भवो नैव ॥ १० ॥

अमलतासकी जड चार तोले, शंखभस्म दो तोले और हरिताल दो तोले इनके कल्कद्वारा एक प्रस्थ गधेके मूत्रमें एक सेर कडवे तेलको विधिपूर्वक पकावे । फिर उस तेलमें शंखभस्म और हरितालका चूर्ण दो दो तोले मिलाकर उसका लेप करनेसे सकल रोम निर्मूल होते हैं । यह कोई असम्भव नहीं ॥

क्षारतैल ।
शुक्तिशम्बूकशङ्खानां दीर्घवृन्तात्समुष्ककात् ।
दग्ध्वा क्षारं समादाय खरमूत्रेण गालयेत् ॥ ११ ॥
क्षाराष्टभागं विपचेत्तैलं वै सार्षपं बुधः ।
इदमन्तःपुरे देयं तैलमात्रेयपूजितम् ॥ १२ ॥
बिन्दुरेकः पतेद्यत्र तत्र लोमापुनर्भवः ।
मदनादिव्रणे तैलमश्विभ्यां परिकीर्तितम् ॥ १३ ॥
अर्शसां कुष्ठरोगाणां पामादद्रुविचर्चिकाम् ।
क्षारतैलमिदं श्रेष्ठं सर्वक्लेदरुजापहम् ॥ १४ ॥

सीपी, घोंघा, शंख, शोनापाठा और मोखा इन सबको समान भाग लेकर अन्तर्धूम की विधिसे दग्धकर क्षार करलेवे । उस क्षारको एक सेर प्रमाण लेकर अठगुने गधेके मूत्रमें भावना देकर २१ बार उस क्षार जलको टपकावे । पश्चात् उक्त क्षारजलके द्वारा सरसोंके तेलको यथाविधि सिद्ध करे । यह तेल आत्रेयकरके पूजित है । इसको अन्तःपुरमें लोमनाशनाथ देना चाहिये । इस तेलकी एक बूँद जिस किसी स्थानमें गिरजाती है फिर वहाँ बाल उत्पन्न नहीं होते । इस तेलको अश्विनीकुमारोंने निर्माण किया है । यह क्षार तेल मदनादि व्रणरोगमें प्रयोग करना चाहिये । यह बवासीर, कुष्ठ, खुजली, दाद, विचर्चिका और सर्व प्रकारके क्लेदयुक्त रोगोंको नष्ट करनेके लिये सर्वोत्तम है ॥ ११-१४ ॥

इति भैषज्यरत्नावल्यां लोमशातनविधिः।

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