भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२५६ भैषज्यरत्नावली । [ वन्ध्या-
वन्ध्याकी चिकित्सा ।
पुष्योद्धतं लक्ष्मणायाश्चक्रङ्गायास्तु कन्यका ।
पिष्टं मूलं दुग्धघृतमृतौ पीतं तु पुत्रदम् ॥ १ ॥
पुष्यनक्षत्रमें लक्ष्मणाकी मूलको उखाडकर उसको घीग्वारके रसमें पीसकर दुग्ध और घृतके साथ मिश्रित करके ऋतुकालमें स्नानानन्तर पान करनेसे पुत्रोत्पत्ति होती है ॥ १ ॥
सुवर्णस्य रूप्यकस्य चूर्णे ताम्रस्य चाज्यसंमिश्रे ।
पीते शुद्धे क्षेत्रे भेषजयोगाद्भवेद्गर्भः ॥२ ॥
रजस्वला स्त्री स्नान करके सुवर्णभस्म, रूप्यकभस्म और ताम्रभस्मको घृतमें मिलाकर सेवन करे तो इससे गर्भोत्पत्ति होती है ॥ २ ॥
कृत्वा शुद्धौ स्नानं विलङ्घ्य दिवसान्तरे ततः प्रातः ।
स्नात्वा द्विजाय दत्त्वा भक्त्या सम्पूज्य लोकनाथेशम् ३
श्वेतबलाङ्घ्रियष्टिकं कर्षं पलं तु शर्करायाः ।
पिष्टैकवर्णजीवद्वत्साया गोस्तु दुग्धेन ॥ ४ ॥
समधिकघृतेन पेयं नात्र दिने देयमन्यच्च ।
समदिवसे शुभयोगे दक्षिणपार्श्वावलम्बिनी धीरा ॥५॥
त्यक्तरुच्यन्तरसङ्गप्रहृष्टमनसोऽतिवृद्धधातोश्च ।
पुरुषस्य सङ्गमात्राल्लभते पुत्रं ततो नियतम् ॥ ६ ॥
ऋतुमती स्त्री ऋतुकालके तीन दिनोंको बिताकर चौथे दिन शुद्ध स्नान करके व्रत करे। फिर पाँचवें दिन प्रातःसमय भगवान्का पूजनकर और ब्राह्मणोंको दान देकर सफेद खिरैंटीकी जड दो तोले, मुलहठी २ तोले और मिश्री ४ तोले इनको एकत्र पीसकर एकवर्ण और जीवितबछडेवाली गौके दूधमें बराबर भागसे कुछ अधिक घी और उक्त औषधिको मिलाकर पान करे। उस दिन और किसी प्रकारके खाद्यको भक्षण नहीं करे। केवल दूध भात खावे। इसके अनन्तर सम-तिथि और शुभयोगमें दहिने भागसे स्थित होकर धैर्यचित्ता स्त्री बलवान् प्रसन्न-चित्तवाले और जिसने अन्य स्त्रीसे संगम न करता हो ऐसे पतिके साथ समागम करे। इस योगके प्रभावसे पुरुषके सङ्गम करतेही निश्चय गर्भ रहजाता है और पुत्रकी प्राप्ति होती है ॥ ३-६ ॥