भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1289

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२५७

गोष्ठजातवटस्य प्रागुदक्शाखाभवे शुभे ।
शुङ्गे माषौ तथा गौरसर्षपौ दधियोजितौ ॥
पुष्यपीतौ द्रुतापन्नसत्त्वायाः पुत्रकारकौ ॥ ७ ॥
बड़के वृक्षकी ईशान कोणमें स्थित शाखाके दो अंकुर, उड़द दो और सफेद सरसोंके दाने दो इनको एकत्र पीसकर दहीमें मिलाकर पुष्यनक्षत्रमें पान करनेसे पुत्रजन्म होता है ॥ ७ ॥

पत्रमेकं पलाशस्य गर्भिणीपयसाऽन्वितम् ।
पीत्वा च लभते पुत्रं रूपवन्तं न संशयः ॥ ८ ॥
स्त्री गर्भिणीके दूधमें ढाकके एक पत्रको पीसकर पीवे तो रूपवान् पुत्रको पाती है । इसमें सन्देह नहीं ॥ ८ ॥

क्वाथेन हयगन्धायाः साधितं सघृतं पयः।
ऋतुस्नाताऽबला पीत्वा गर्भं धत्ते न संशयः ॥ ९ ॥
असगन्धकी जडके क्वाथके साथ घृत मिलाकर दूधको सिद्ध करलेवे । उस दूधको ऋतुमती स्त्री स्नान करनेके अनन्तर पान करे तो निस्सन्देह गर्भको धारण करती है ॥ ९॥

पिप्पली शृङ्गवेरं च मरिचं नागकेशरम् ।
घृतेन सह पातव्यं वन्ध्याऽपि लभते सुतम् ॥ १० ॥
ऋतुकालमें स्नान करके पीपल, सोंठ, कालीमिरच, नागकेशर इनके समानभाग मिश्रित चूर्णको घृतके साथ सेवन करनेसे वन्ध्या स्त्रीभी पुत्रवती होतीहै ॥

कृष्णापराजितामूलं बस्तक्षीरेण संपिबेत् ।
ऋतुस्नाता त्रिधा या तु वन्ध्या गर्भवती भवेत् ॥ ११ ॥
काली अपराजिताकी जडको बकरीके दूधमें पीसकर रजस्वला स्त्री तीन दिनतक पीवे तो वन्ध्यास्त्री गर्भवती होती है ॥ ११ ॥

काकोल्यौ लक्ष्मणामूलं तथा षष्टिकतण्डुलम्।
नार्यैकवर्णापयसा पीत्वा गर्भवती ऋतौ ॥ १२ ॥
काकोली, क्षीरकाकोली, लक्ष्मणाकी जड और सांठीके चावल इन सबको एकत्र पीसकर एकरंगवाली गौके दूधके साथ ऋतुकालमें सेवन करनेसे वन्ध्या स्त्री गर्भवती होती है ॥ १२ ॥

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