भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । ९७
शुद्ध मीठा तेलिया, सोंठ, मिरच, पीपल, नागरमोथा, हल्दी, नीमके पत्ते और वायविडंग इन आठों औषधियोंके समानभाग चूर्णको और सब चूर्णके बराबर अरणीकी जडके चूर्णको लेकर बकरेके मूत्रमें खरलकरके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । ये गोलियाँ अत्यन्त योगवाही हैं। अनुपानभेदसे ज्वरादि विविध प्रकारके रोगोंको दूर करती हैं ॥ ५७॥
जयन्तीवटी ।
विषं पाठाऽश्वगन्धा च वचा तालीशपत्रकम् ।
मरिचं पिप्पली निम्बमजामूत्रेण तुल्यकम् ।
वटिका पूर्ववत्कार्या जयन्ती योगवाहिका ॥ ५८ ॥
शुद्ध वत्सनाभ, पाठ, असगन्ध, वच, तालीशपत्र, मिरच, पीपल और नीमके पत्ते ये प्रत्येक औषधि समानभाग और अरणीकी जड सबके बराबर भाग लेकर समस्त औषधियोंको एकत्र पीसकर बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णको बकरीके मूत्रमें खरलकरके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । यह जयन्ती-वटी भी योगवाही है । यह भी अनुपानभेदसे सर्वरोगोंको नष्ट करती है ॥ ५८ ॥
योगवाहिका जया जयन्ती वटी ।
जयन्ती वा जया वाऽथ क्षीरैः पित्तज्वरापहा ।
मुद्गामलकयूषेण पथ्यं देयं घृतं विना ॥ ५९ ॥
जयन्ती वटी अथवा जया वटीको गोदुग्धके साथ सेवन करनेसे पित्तज्वर शीघ्र दूर होता है । इसपर मूंगके यूषका अथवा आमलोंके यूषका पथ्य देवें, किन्तु घृत डालकर न दे ॥ ५९ ॥
जयन्ती वा जया वाऽथ सक्षौद्रा मरिचान्विता ।
सन्निपातज्वरं हन्ति रसश्चानन्दभैरवः ॥ ६० ॥
जयावटी अथवा जयन्तीवटी या आनन्दभैरवरसको कालीमिरचोंके चूर्ण और शहदमें मिलाकर सेवन करनेसे सन्निपातज्वर नष्ट होता है ॥ ६० ॥
जयन्ती वा जया वाऽथ विषमज्वरनुद् घृतैः ।
सर्वज्वरं मधुव्योषैर्गवां मूत्रेण शीतकम् ।
चन्दनस्य कषायेण रक्तपित्तज्वरापहा ॥ ६१ ॥
जयन्ती अथवा जयावटी घृतके साथ सेवन करनेसे विषमज्वर, मधु और त्रिकुटेके चूर्णके साथ खानेसे सब प्रकारके ज्वर, गोमूत्रके अनुपानसे शीतज्वर और चन्दनके काढेके साथ सेवन करनेसे रक्तपित्त ज्वर दूर होते हैं ॥ ६१ ॥
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