भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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जयन्ती वा जया वाऽथ माक्षिकेण च कासजित् ।
जयन्ती वा जया वाऽथ क्षीरैः पाण्डुविनाशिनी ॥ ६२ ॥
जयन्ती वा जया वाऽथ तण्डुलोदकपानतः ।
अश्मरीं हन्ति नो चित्रं मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् ॥ ६३ ॥
मधुके साथ सेवन करनेसे खाँसी, दूधके साथ पाण्डुरोग, चावलोंके जलके साथ पथरीरोग और दारुण मूत्रकृच्छ्ररोग निस्सन्देह नष्ट होता है ॥ ६२ ॥ ६३ ॥
जयन्तीं वा जयां वाऽथ गोमूत्रेण युतां पिबेत् ।
हन्त्याशु काकणं कुष्ठं तल्लेपेन च तद् ध्रुवम् ॥ ६४ ॥
जया अथवा जयन्तीवटीको गोमूत्रके साथ सेवन करने अथवा गोमूत्रके साथ पीसकर उसका लेप करनेसे काकणनामक कुष्ठ शीघ्र दूर होता है ॥ ६४ ॥
द्विनिष्कं केतकीमूलं पिष्ट्वा तोयेन पाययेत् ।
जयन्ती वा जया वाऽथ मेहं हन्ति सुराह्वयम् ॥ ६५ ॥
आठ माशे केतकी (केवडे) की जडको पानीमें पीसकर उस पानीके साथ जया अथवा जयन्ती वटीको सेवन करनेसे सुरामेह शमन होता है ॥ ६५ ॥
जयन्ती वा जया वाऽथ मधुना सर्वमेहजित् ॥ ६६ ॥
लोध्रं मुस्ताऽभया तुल्यं कट्फलं च जलैः सह ।
क्वाथयित्वा पिबेच्चानु मधुना सर्वमेहनुत् ॥ ६७ ॥
मधुके साथ सेवन करनेसे सब प्रकारके प्रमेह नष्ट होते हैं अथवा उक्त औषधि सेवन करनेके पश्चात् लोध, नागरमोथा, हरड और कायफल इनका क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर पान करनेसे भी सम्पूर्ण प्रमेह नष्ट होते हैं ॥ ६६ ॥ ६७ ॥
जयन्ती वा जया वाऽथ गुडैः कोष्णजलैः सह ।
त्रिदोषोत्थं हरेद् गुल्मं रसो वाऽऽनन्दभैरवः ॥ ६८ ॥
जया अथवा जयन्तीवटी या आनन्दभैरव रसको गुडमें मिलाकर उष्णजलके साथ सेवन करनेसे त्रिदोषजनित गुल्मरोग दूर होता है ॥ ६८ ॥
जयन्ती वा जया वाऽथ हन्ति शुण्ठ्या भगन्दरम् ।
जयन्ती वा जया वाऽथ तक्रेण ग्रहणीप्रणुत् ॥ ६९ ॥
जयन्ती वा जया वाऽथ रसश्चानन्दभैरवः ।
रक्तपित्ते त्रिदोषोत्थे शीततोयेन पाययेत् ॥ ७० ॥