भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1292

१२६० भैषज्यरत्नावली । [ गर्भिणीरोग-


बलाबल विचारकर उचित मात्रासे प्रातःसमय गर्भिणीस्त्रीको पान करावे । एवं गोखुरू, कटेरी, सुगन्धवाला और नीलकमल इनको एकत्र दूधमें पीसकर पान करानेसेभी गर्भका शूल निवृत्त होता है ॥ १० ॥ ११ ॥

पञ्चमे मासि गर्भे तु यदा भवति वेदना ।
तत्र नीलोत्पलं वीरां पिष्ट्वा क्षीरेण पाचनम् ॥१२॥
घृतक्षौद्रान्वितं पीत्वा गर्भस्य च रुजं हरेत् ।
तथा नीलोत्पलं नारीं काकोलीं समभागिकाम् ॥१३॥
शीततोयेन पिष्ट्वा च क्षीरेणालोड्य पाययेत् ।
अनेन विधिना गर्भः स्थिरः स्याद्रुक् प्रशाम्यति ॥१४॥

जो पाँचवें महीनेमें गर्भवतीके गर्भवेदना हो तो नीलकमल और क्षीरकाकोली इनको दूधके साथ पीसकर घृत और शहदमें मिलाकर पान करानेसे गर्भकी पीडा दूर होती है तथा नीलकमल घीग्वार और काकोली इन तीनोंको समान भाग लेकर शीतल जलके साथ पीसकर और दूधमें मिलाकर गर्भवती स्त्रीको पान करावे । इससे गर्भ स्थिर होजाता है, समस्त पीडा शमन होती है ॥

षष्ठे मासि यदा गर्भे वेदना जायते तदा ।
मातुलुङ्गस्य बीजानि प्रियङ्गुं चन्दनोत्पलम् ॥
क्षीरेणालोड्य पातव्यं गर्भशूलनिवारणम् ॥ १५ ॥
तथा पियालबीजानि मृद्वीका लाजसक्तवः ।
एतत्सुशीतलं काले पीत्वा च सुखमश्नुते ॥ १६ ॥

यदि छठ्ठे मासमें गर्भिणीके वेदना हो तो बिजौरेंनींबूके बीज फूलप्रियंगु, लालचन्दन और नीलकमल समान भाग मिश्रित इनको एकत्र पीसकर दूधके साथ मिलाकर पीवे अथवा चिरौंजी, दाख और खीलोंके सत्तू शीतल दूधमें पीसकर प्रातःसमय पीवे तो गर्भकी पीडा दूर होती है और सुख प्राप्त होता है ॥

सप्तमे शतपुत्रीं च मृणालसहितां पिबेत् ।
पिष्ट्वा क्षीरेण शूलार्त्ता गर्भिणी या सुखार्थिनी ॥१७॥
कपित्थकमुकान्मूलं सलाजं शर्करायुनम् ।
शीततोयेन संपिष्टं क्षीरेणालोड्य पाययेत् ॥
पीत्वा हन्त्यबला शीघ्रं शूलं गर्भसमुद्भवम् ॥ १८ ॥