भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२५९


भसींडा और शालिचावल इनको सम भाग ले दूधमें पीसकर मिश्री और शहद मिलेहुए दूधके साथ पान करावे तो उक्त वेदना दूर होती है । औषधिके पचजानेपर स्त्रीको दुग्धमिश्रित अन्नका भोजन कराना श्रेष्ठ है ॥ १-४ ॥

द्वितीये मासि गर्भे तु यदा भवति वेदना ।
तदोत्पलस्य कल्कं तु शृङ्गाटककशेरुकम् ॥ ५ ॥
तण्डुलोदकपिष्टं तु पाययेत्तण्डुलाम्बुना ।
निवार्य गर्भशूलं च स्थिरं गर्भं करोति च ॥ ६ ॥

यदि द्वितीय मासमें अकस्मात् गर्भिणीके वेदना उत्पन्न हो तो कमल, सिंघाडा और कसेरू इनको समानांश ले चावलोंके जलमें पीसकर चावलोंके जलके साथ पान करनेसे गर्भशूल दूर होकर गर्भ स्थिर होजाता है ॥ ५ ॥ ६ ॥

तृतीये क्षीरकाकोलीं काकोल्यामलकीफलम् ।
पिष्टमुष्णोदकेनैतत् पाययेद्गर्भिणीं भिषक् ॥ ७॥
शाल्यन्नं पयसा जीर्णे भोजयेत्तु गर्भिणीम् ।
तथा पद्मोत्पलं कुष्ठं शालूकं च समांशिकम् ॥ ८ ॥
सितोदकेन पिष्ट्वा तु क्षीरेणालोड्य पाययेत् ।
तेन शूलं निवर्त्तेत न गर्भो व्यथते ध्रुवम् ॥ ९ ॥

तीसरे महीनेमें गर्भवती स्त्रीके पीडा उत्पन्न हो तो वैद्य, क्षीरकाकोली, काकोली और आमले इनको समान भाग लेकर गरम जलके साथ पीसकर उक्त स्त्रीको पान करावे और औषधिके पचजानेपर शालिचावलोंका भात दूधके साथ भोजन करावे अथवा नीलकमल, पद्माख, कूठ और भसींडा इनको बराबर भाग ले मिश्रीके शर्बतद्वारा पीसकर दूधमें मिलाकर पान करावे । इस प्रकार करनेसे उपर्युक्त पीडा शान्त होजाती है, फिर गर्भ व्यथित नहीं होते ॥ ७-९ ॥

चतुर्थे तु विधानज्ञः पाययेदिदमौषधम् ।
पिष्टोत्पलं च शालूकं कण्टकारीं त्रिकण्टकम् ॥ १० ॥
यथाग्नि मात्रया काले गर्भिणीं पयसा सह ।
तथा गोक्षुरकं सिंहीं बालकं नीलमुत्पलम् ॥
पिष्ट्वा क्षीरेण पातव्यं गर्भशूलनिवारणम् ॥ ११ ॥

चौथे महीनेमें गर्भिणीके पीडा होनेपर वैद्य नीलकमल, भसींडा, कटेरी और गोखुरू इन औषधियोंको समान भाग लेकर सबको दूधमें खरल करके अग्निका