भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२६४ भैषज्यरत्नावली । [ गर्भिणीरोग-
कुशकाशोरुबूकानां मूलैर्गोक्षुरकस्य च । शृतं दुग्धं सितायुक्तं गर्भिण्याः शूलनुत्परम् ॥ ३६ ॥ कुशा, काँस, अण्ड और गोखुरू इनकी जड़ोंको समान भाग मिलित दो तोले लेवे। फिर इनके द्वारा आठ तोले दूधको ३२ तोले जलमें पकावे । जब दूध मात्र अवशिष्ट रहजाय तब शीतल होनेपर मिश्री डालकर गर्भिणीको पान करावे। इससे गर्भशूल निवारण होता है ॥ ३६ ॥
कशेरुशृङ्गाटकजीवनीयैः पद्मोत्पलैरण्डशतावरीभिः । सिद्धं पयः शर्करया विमिश्रं संस्थापयेद्गर्भमुदीर्णवेगम् ॥३७॥ कसेरू, सिंघाडे, जीवनीगणकी औषधियें, कमलकेशर, नीलोफर, अण्डकी जड और शतावर इनके द्वारा विधिपूर्वक दूधको सिद्ध कर उसमें मिश्री मिलाकर शीतल करके गर्भवतीस्त्रीको पान करावे तो इससे गर्भपातका दारुण वेग रुक जाता है और गर्भ स्थिर होजाता है ॥ ३७ ॥
कशेरुशृङ्गाटकपद्मकोत्पलं समुद्रपर्णीमधुकं सशर्करम् । सशूलगर्भस्रुतिपीडिताऽङ्गना पयोविमिश्रं पयसाऽन्नभुक्पिबेत् कसेरू, सिंघाडे, पद्माख, नीलकमल, मुगवन, मुलहठी और मिश्री इनको समान भाग लेकर सबको एकत्र पीसकर दूधके साथ पानकरे और दूध, भातका भोजन करें तो गर्भस्रावकी पीडासे पीडित स्त्री सुखी होती है ॥ ३८ ॥
गर्भे शुष्के तु वातेन बालानां चापि शुष्यताम् । सितामधुककाश्मर्यैर्हितमुत्थापने पयः ॥ ३९ ॥ वातदोषके कारण गर्भिणी अथवा गर्भमें बालक सूखता हो तो मुलहठी और कुम्मेरके कल्कद्वारा दूधको पकाकर शीतल होजानेपर उसमें मिश्री डालकर पीना हितकारी है। इससे गर्भ पुष्ट होता है ॥ ३९ ॥
आम्रजम्बुत्वचः क्वाथं लेहयेल्लाजसक्तुभिः । अनेन लीढमात्रेण गर्भिणी ग्रहणीं जयेत् ॥ ४० ॥ आमकी छाल और जामुनकी छाल इनके क्वाथको यथाविधि बनाकर उसमें, खीलोंके सतुओंको मिलाकर चाटनेसे ही गर्भिणीकी संग्रहणी दूर होती है ४०
“ अत्र सामान्यज्वरोक्ताः कषायाश्च बुद्ध्या देयाः । ” सिंहास्यादिर्गूडूच्यादिः पञ्चमूलीरसोऽपि वा । मधुना शमयन्त्येते गर्भिण्या ज्वरमाशु च ॥ ४१ ॥