भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२६५
गर्भिणीस्त्रीको ज्वर हो तो सामान्यज्वरमें कहेहुए क्वाथ विचारपूर्वक देवे । ज्वराधिकारोक्त सिंहास्यादि, गुडूच्यादि अथवा पंचमूली आदिके क्वाथको शहदके साथ किंवा पंचमूलके द्वारा सिद्ध किया हुआ शृतित दूध गर्भवती स्त्रीको पान करावे । ये सब ज्वरको तत्काल नष्ट करते हैं ॥ ४१ ॥
रोमराजी भवेद्यस्या वामपार्श्वे समुच्छ्रिता ।
कन्यां तस्या विजानीयाद्दक्षिणे च तथा सुतम् ॥ ४२ ॥
जिस गर्भिणीस्त्रीके बाईं पसलीमें रोमपंक्ति उत्पन्न हो उसके कन्या और जिसके दाहिनी पसलीमें रोम उत्पन्न हों उसके पुत्र होना जानना चाहिये ॥ ४२ ॥
धन्वन्तरिमतेनैव साध्वाज्ञातश्च शास्त्रवित् ।
सम्प्राप्ते चाष्टमे मासे मैथुनं परिवर्जयेत् ॥ ४३ ॥
यदि गच्छति दुर्मेधाः काममोहादचेतनः ।
विपद्यते तदा गर्भो गर्भिणी च विनश्यति ॥
अन्धमूकद्विबधिरो जायते कुब्ज एव वा ॥ ४४ ॥
धन्वन्तरिके मतसे शास्त्रके जाननेवाला विद्वान् आठवें महीनेके उपस्थित होनेपर मैथुनको सर्वथा त्यागदेवे । यदि दुष्टबुद्धि पुरुष कामके मोहसे असावधान होकर स्त्रीके पास गमन करता हैतो गर्भ और गर्भिणी दोनों नष्ट होजाते हैं अथवा अन्धी, गूँगी, बहिरी और कुबड़ी सन्तान होती है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥
पाठालाङ्गलिसिंहास्यमयूरकजटैः पृथक् ।
नाभिवस्तिभगालेपात्सुखं नारी प्रसूयते ॥ ४५ ॥
पाठ, कालिहारीकी जड, अडूसेकी जड और चिरचिटेकी जटा इनमेंसे किसीएक वस्तुको पीसकर गर्भिणीकी नाभि, वस्ति और भगमें लेप करनेसे सुखपूर्वक प्रसव होता है ॥ ४५ ॥
मातुलुङ्गस्य मूलानि मधुकं मधुसंयुतम् ।
घृतेन सह पातव्या सुखं नारी प्रसूयते ॥ ४६ ॥
बिजौरैनींबूकी जड और मुलहठीको पीसकर शहद और घीके साथ मिलाकर गर्भिणीको पान करानेसे सुखसे प्रसव होता है ॥ ४६ ॥
अथोभयपञ्चदशकं दर्शयेत्—
यथा वसुगुणाब्ध्येकबाणनवषट्सप्तयुगैः क्रमात् ।
सर्वपञ्चदशं द्विस्तु त्रिंशकं नवकोष्ठके ॥ ४७ ॥
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