भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1298
१२६६भैषज्यरत्नावली ।[ गर्भिणीरोग-

नाडीऋतुवसुभिः सहपक्षदिगष्टादशभिरेव च ।
अर्कभुवनाब्धिसहितैरुभयत्रिंशकमाश्चर्यम् ॥
उभयोरेकतरं शरावे लिखित्वा प्रदर्शयेत् ॥ ४८ ॥

जब प्रसवकालमें जीवितगर्भके प्रसव होनेमें बिलम्ब होतो गर्भिणी स्त्रीको उल्लिखित उभय पञ्चदशक उभय त्रिंशकयन्त्र नवीन सकोरेमें लिखकर दिखावें ।

प्रथम नौ कोठोंमें लिखित वसु ८, गुण ३, वेद ४, इन्दु १, बाण ५, अंक ९, षडानन ६, समुद्र ७, मिथुन २ इन अङ्कोंवाला कोष्ठक उभय पंचदशक और दूसरे नव कोष्ठकमें लिखित नाडी १६, ऋतु ६, वसु ८, पक्ष २, दिशा १०, अङ्ग १८, आदित्य १२, भुवन १४ और समुद्र ४ अङ्कोंवाला यन्त्र उभयत्रिंशक कहलाता है । ये दोनों आश्चर्यप्रद यन्त्र अलग अलग सकोरेंमें लिखकर दिखावे और निम्नलिखित श्लोकका पाठ करे ॥

उभयपञ्चदशक.

उभयत्रिंशक.

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प्रसवमन्त्र ।

गङ्गाया उत्तरे तीरे जम्भला नाम राक्षसी ।
तस्याः स्मरणमात्रेण सद्यो नारी प्रसूयते ॥ ४९ ॥

श्रीगंगाजीके उत्तर तटपर जम्भलानामावाली राक्षसी है । उसके स्मरण करनेसे स्त्रीकी तत्काल सन्तान उत्पन्न होतीहै । ऊपर लिखे यन्त्रोंकी क्रिया और श्लोक पाठ किसी सदाचारी और विद्वान् ब्राह्मणद्वारा कराना चाहिये ॥ ४९ ॥

गृहाम्बुना गृहधूमपानं गर्भापकर्षणम् ॥ ५० ॥

काँजीके साथ घरके धूमको पान करनेसे विघ्नरहित शीघ्र प्रसव होताहै ॥ ५० ॥

पुटदग्धसर्पकञ्चुकमसृणमसीकुसुमसारसहिताक्षी ।
झटिति विशल्या जायते गर्भिणी मूढगर्भापि ॥ ५१ ॥

साँपकी केंचलीको अन्तर्धूमकी रीतिसे दग्ध करके उस भस्मको शहदमें मिलाकर गर्भवती स्त्रीके नेत्रोंमें आँजनेसे मूढगर्भभी तत्काल उत्पन्न होताहै ॥ ५१ ॥

स्नुहीक्षीरं तथा स्तोकं गर्भिण्याः शिरसि क्षिपेत् ।
मृतगर्भं तथा सूते गर्भिणी रमणी द्रुतम् ॥ ५२ ॥

गर्भिणीस्त्रीके शिरपर थोडासा थूहरका दूध डालेतो मृतगर्भ बिनाक्लेशके बहुत जल्द प्रसव होजाता है ॥ ५२ ॥