भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1299, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा १ भाषाटीकासहिता । १२६७
गृहाम्बुना हिङ्गुसिन्धुपानं गर्भापकर्षणम् ॥
काँजीके साथ हींग और सेंधेनमकको मिलाकर पान करनेसे सुखपूर्वक प्रसव होता है ॥
करिदमनदहनमूलं पिष्टं सलिलेन पीतं सद्यः ।
चिरमचिरजं गर्भं मृतममृतं वा निपातयति ॥ ५३ ॥
नागदौनकी जड और चीतेकी जड इन दोनोंको जलमें पीसकर पीनेसे (पूर्णगर्भा- या अपूर्णगर्भा ) स्त्रीके मृत अथवा जीवित सन्तान निर्विघ्नतापूर्वक शीघ्र पतित होती है ॥ ५३ ॥
पोतकीमूलकल्केन तिलतैलयुतेन वा ।
योनेरभ्यन्तरं लिप्त्वा सुखं नारी प्रसूयते ॥ ५४ ॥
पोईशाककी जडको तिलके तेलमें पीसकर स्त्रीकी योनिके भीतर लेप करनेसे स्त्री सुखपूर्वक प्रसववती होती है ॥ ५४ ॥
वातेन गर्भसंकोचात्प्रसूतिसमयेऽपि वा ।
गर्भं न जनयेन्नारी तस्याः शृणु चिकित्सितम् ॥ ५५ ॥
कुट्टयेन्मुसलेनैषा कृत्वा धान्यमुलूखले ।
विषमं चाशनं पानं सेवेत प्रसवार्थिनी ॥ ५६ ॥
वायुके कारण गर्भके संकोच होनेसे निर्दिष्ट समयमें सन्तान उत्पन्न न हों तो ओखलीमें मूसलसे धान कूटकर गर्भिणी स्त्रीको सेवन करावे और विषम अन्न पानका व्यवहार करावे ॥ ५५ ॥ ५६
प्रसवस्य विलम्बे तु धूपयेदभितो भगम् ।
कृष्णसर्पस्य निर्मोकैस्तथा पिण्डीतकेन वा ॥ ५७ ॥
प्रसव होनेमें बहुत देर होजाय तो काले साँपकी केंचली अथवा मैनफलके द्वारा योनिके चारों ओर धूप देवे ॥ ५७ ॥
ह्रीबेरातिविषामुस्तामोचशक्रैः शृतं जलम् ।
दद्याद्गर्भे प्रचलिते प्रदरे कुक्षिरुज्यपि ॥ ५८ ॥
सुगन्धवाला, अतीस नागरमोथा, मोचरस और इन्द्रजौ इनका यथोविधि क्वाथ बनाकर उसको शीतल करके चलायमानगर्भ, प्रदर और कुक्षिशूलमें पान कराना चाहिये ॥ ५८ ॥