भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा] भाषाटीकासहिता । १२६९
लवङ्गादिचूर्ण ।
लवङ्गं टङ्कणं मुस्तं धातकी बिल्वधान्यकम् ।
जातीफलं सर्जकं च शताह्वा दाडिमं तथा ॥ ६५ ॥
जीरकं सैन्धवं मोचं नीलोत्पलरसाञ्जनम् ।
अभ्रकं वङ्गकं चैव समङ्गा रक्तचन्दनम् ॥ ६६ ॥
विश्वं चातिविषा शृङ्गी खदिरं बालकं समम् ।
एतच्चूर्णं पाययेत संग्रहग्रहणीहरम् ॥
छागीदुग्धेन मतिमान् गर्भिणीमनुपानतः ॥ ६७ ॥
नानावर्णमतीसारं ज्वरं चैव नियच्छति ।
आमरक्तातिसारघ्नं शूलशोथनिषूदनम् ॥ ६८ ॥
लौङ्ग, सुहागा, नागरमोथा, धायके फूल, बेलगिरी, धनियाँ, जायफल, राल, सोया, अनारका वल्कल, जीरा, सैंधानमक, मोचरस, नीलकमलकी जड, रसौत, अभ्रक, वङ्ग, वराहक्रान्ता, लालचन्दन, सोंठ, अतीस, काकडासिंगी, खैर, सुगंधवाला इनके चूर्णको समान भाग लेकर एकत्र करलेवे । बुद्धिमान् वैद्य गर्भिणीस्त्रीको यह चूर्ण बकरीके दूधके साथ सेवन करावे । यह स्त्रियोंकी संग्रहणी, अनेक प्रकारके अतीसार, ज्वर, आमरक्त, शूल और शोथको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ६५-६८ ॥
गर्भविलासरस ।
रसगन्धकतुत्थं च त्र्यहं जम्बीरमर्दितम् ।
त्रिर्भावितं त्रिकटुना देयं गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ ६९ ॥
गर्भिण्याः शूलविष्टम्भज्वराजीर्णेषु केवलम् ।
तुत्थस्थाने यदि स्वर्णं चिन्तामणिरसः स्मृतः ॥ ७० ॥
शोधित पारा, गन्धक और तूतिया इनको एकत्र जम्बीरीनींबूके रसमें तीन दिनतक खरल करे फिर त्रिकटुके क्वाथमें तीन बार भावना देकर चार चार रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ।। यह रस गर्भवतीस्त्रीके शूल, विष्टम्भ, ज्वर और अजीर्णादि विकारोंमें प्रयोग करना चाहिये । इस औषधिमें यदि तूतियेकी जगह सुवर्ण डाला जाय तो यही रस “गर्भचिन्तामणि” कहलाता है ॥ ६९ ॥ ७० ॥
गर्भविनोदरस ।
देयं त्रिभागं त्रिकटु चतुर्भागं च हिङ्गुलम् ।
जातीकोषं लवङ्गं च प्रत्येकं च त्रिकार्षिकम् ॥ ७१ ॥