भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 1302

१२७० भैषज्यरत्नावली । [ गर्भिणीरोग-

सुवर्णमाक्षिकं चैव पलार्द्धं प्रक्षिपेद् बुधः । जलेन मर्दयित्वा च चणमात्रा वटी कृता ॥ निहन्ति गर्भिणीरोगं भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ७२ ॥

सोंठ, मिरच, पीपल प्रत्येक एक-एक तोला और सिंगरफ चार तोले, जावित्री तीन कर्ष, लौंग तीन कर्ष एवं सोनामाखी दो तोले इन सबको एकत्र जलके साथ खरल करके चनेकी बराबर गोलियाँ बनालेवे । यह रस यथाविधि सेवन करनेसे गर्भवतीस्त्रीके समस्त रोगोंको नष्ट करता है ॥ ७१ ॥ ७२ ॥

गर्भचिन्तामणि ।

जातीफलं टङ्कणं च व्योषं दैत्येन्द्ररक्तकम् । तच्चूर्णं समभागेन मर्दितं प्रहरद्वयम् ॥ ७३ ॥ जम्बीररसयोगेन वटीं कुर्याद्विचक्षणः । गुञ्जाद्वयप्रमाणां तु खलु वैद्यः प्रयत्नतः ॥ ७४ ॥ आर्द्रकस्य रसेनैव भक्षयेदुष्णवारिणा । निहन्ति सर्वरोगं च भास्करस्तिमिरं यथा ॥ ७५ ॥

जायफल, सुहागा, सोंठ, मिरच, पीपल और सिंगरफ इनको समान भाग लेकर जम्बीरीनींबुके रसमें दो प्रहरतक उत्तम प्रकार खरल करे, फिर इसकी दो दो रत्तीकी सुन्दर गोलियाँ प्रस्तुत करे । प्रतिदिन एक एक वटी अदरखके रस अथवा गरम जलके साथ भक्षण करे तो इससे गर्भिणीस्त्रीके अशेषरोग निश्चय नाश होते हैं ॥ ७३-७५ ॥

गर्भचिन्तामणिरस ।

रसं तारं तथा लौहं प्रत्येकं कर्षमात्रकम् । कर्षद्वयं तथा चाभ्रं कर्पूरं वङ्गताम्रकम् ॥ ७६ ॥ जातीफलं तथा कोषं गोक्षुरं च शतावरी । बलातिबलयोर्मूलं प्रत्येकं तोलकं शुभम् ॥ ७७ ॥ वारिणा वटिका कार्या द्विगुञ्जाफलमानतः । सन्निपातं निहन्त्याशु स्त्रीणां चैव विशेषतः ॥ गर्भिण्या ज्वरदाहं च प्रदरं सूतिकामयम् ॥ ७८ ॥

रससिन्दूर, रूपा और लोहा ये प्रत्येक एक एक कर्ष, अभ्रक दो कर्ष, कपूर, वङ्ग, ताम्रभस्म, जायफल, जावित्री, गोखुरू, शतावर तथा खिरेंटी और कंधी