भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1306, कुल 1416 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1306

१२७४ | भैषज्यरत्नावली । | [ सूतिकारोग-

सहचरकृतः क्वाथः पिप्पलीचूर्णसंयुतः । दीपनो ज्वरदोषामसूतिका रोगनाशनः ॥ ५ ॥ पीले पियाबाँसेके क्वाथको पीपलका चूर्ण मिलाकर पान करनेसे प्रसूता स्त्रीका ज्वर, प्रसूत और आमदोष नष्ट होकर अग्नि दीपन होती है ॥ ५ ॥

पीतकुरुण्टकथितं रजनी पर्युषितं शीतमपहरति । सूतीरोगान्सहस्रं तन्मूलं चर्वितं तद्वत् ॥ ६ ॥ पीलीकटसरैयाके बासी क्वाथको हल्दीका चूर्ण मिलाकर प्रातःकाल पान करे अथवा एकमात्र पीलीकटसरैयाकी जडको चाबे तो प्रसूताके हजारों रोग नष्ट होजाते हैं ॥ ६ ॥

दशमूलक्वाथ । दशमूलीकृतः क्वाथः साज्यः सूतिरुजापहः ॥ ७ ॥ दशमूलके काढेको घृत मिलाकर पीनेसे प्रसूत रोग नष्ट होता है ॥ ७ ॥

अमृतादि । अमृतानागरसहचरभद्रोत्कटपञ्चमूलजलदजलम् । पीतं मधुसंयुक्तं निवारयति सूतिकातङ्कम् ॥ ८ ॥ गिलोय, सोंठ, पियाबाँसा, पसरन, शालपर्णी, पृश्चिपर्णी, कटेरी, बडीकटेरी, गोखुरू, नागरमोथा और सुगन्धवाला इनका एकत्र क्वाथ बनाकर उसमें शहद डालकर पान करनेसे सूतिकारोग नाश होता है ॥ ८ ॥

सहचरादि १-२ । सहचरपुष्करवेतसमूलं विकङ्कतदारुकुलत्थसमम् । जलमत्र ससैन्धवहिङ्गुयुतं सद्योज्वरसूतिकाशूलहरम् ॥ ९ ॥ १-पीलापियाबाँसा, पोहकरमूल, बेंतकी जड, कण्टाई, देवदारु और कुलथी इनको समान भाग लेकर क्वाथ बनावे । उसमें सैंधानमक और हींग डालकर सुहाता २ पान करे तो सूतिकाजन्य ज्वर और शूल तत्काल दूर होता है ॥ ९ ॥

सहचरमुस्तगुडूचीभद्रोत्कटविश्वबालकैःकथितम् । पेयमिदं मधुमिश्रं सद्योज्वरशूलनुत्सूत्याः ॥ १० ॥ १-पियाबाँसा, नागरमोथा, गिलोय, पसरन, सोंठ और सुगन्धवाला इनके क्वाथको शहद मिलाकर पीनेसे प्रसूताका ज्वर और शूल जल्द नष्ट होता है ॥