भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1307, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1307

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२७५

सूतिकादशमूल ।

शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहतीद्वयगोक्षुरम् ।
दासी प्रसारणी विश्वं गुडूची मुस्तकं तथा ॥
निहन्ति सूतिकारोगं ज्वरदाहसमन्वितम् ॥ ११ ॥

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कटेरी, बडीकटेरी, गोखुरू, पीलापियाबाँसा, प्रसारणी, सोंठ, गिलोय और नागरमोथा इनका यथाविधि काथ बनाकर सेवन करनेसे ज्वर और दाहसहित प्रसूतरोग नष्ट होता है ॥ ११ ॥

बृहद्धीबेरादि ।

ह्रीबेरारलुरक्तचन्दनबलाबन्याकवत्सादिनी-
मुस्तोशीरयवासपर्पटविषाक्वाथं पिबेद्गर्भिणी ।
नानादोषयुतातिसारकगदे रक्तस्रुतो वा ज्वरे
योगोऽयं मुनिभिः पुरा निगदितः सूत्यामये शस्यते॥१२॥

सुगन्धवाला, शोनापाठा, लालचन्दन, खिरैंटी, धनियाँ, गिलोय, नागरमोथा, खस, धमासा, पित्तपापडा और अतीस इनका काथ बनाकर गर्भिणी स्त्री पान करे । यह क्वाथ अनेक दोषोंसे युक्त अतीसाररोगमें, रक्तस्राव और ज्वरमें हितकारी है । इस योगको पूर्वकालमें आयुर्वेदाचार्योने सूतिकारोगको नष्ट करनेके लिये वर्णन किया है ॥ १२ ॥

देवदार्वादि ।

देवदारु वचा कुष्ठं पिप्पली विश्वभेषजम् ।
भूनिम्बकट्फलं मुस्तं तिक्ता धान्या हरीतकी ॥ १३ ॥
गजकृष्णा सदुस्पर्शा गोक्षुरो धन्वयासकः ।
बृहत्यतिविषा छिन्ना कर्कटः कृष्णजीरकः ॥ १४ ॥
समभागान्वितैरेतैः सिन्धुरामठसंयुतम् ।
क्वाथमष्टावशेषं तु प्रसूतां पाययेत्स्त्रियम् ॥ १५ ॥

देवदारु, वच, कूट, पीपल, सोंठ, चिरायता, कायफल, नागरमोथा, कुटकी, धनियाँ, हरड, गजपीपल, कटेरी, गोखुरू, धमासा, बडीकटेरी, अतीस, गिलोय, काकडासिंगी और कालाजीरा इन सबको समान भाग लेकर अष्टमांशावशेष क्वाथ बनावे । उसमें हींग और सेंधानमक डालकर प्रसूतास्त्रीको पान करावे ॥१३-१५॥

शूलकासज्वरश्वासमूर्च्छाकम्पशिरोर्त्तिभिः ।
युक्तं प्रलापतृड्दाहतन्द्रातीसारवान्तिभिः ॥ १६ ॥

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