भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1319, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२८७
घृतप्रस्थं विपक्तव्यं गर्भं दत्त्वा तु कार्षिकम् ।
सव्योषं पिप्पलीमूलं चित्रकं जीरकं तथा ॥ ९१ ॥
पञ्चमूलं कनिष्ठं च रास्नैरण्डसमन्वितम् ।
बला सिन्धूद्यवक्षारस्वर्जिकाकृष्णजीरकम् ॥ ९२ ॥
सिद्धमेतद् घृतं सद्यो निहन्यात्सूतिकामयान् ।
ग्रहणीं पाण्डुरोगं च अर्शांसि विविधानि च ॥
अग्निं च कुरुते दीप्तं स्त्रीणां स्तन्यविशोधनम् ॥ ९३ ॥
जड, पत्ते और शाखासहित प्रसारणीको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उसमें घी १ प्रस्थ तथा त्रिकुटा, पीपलामूल, चीता, जीरा, लघु पञ्चमूल, रास्ना, अण्डकी जड, खिरेंटी, सेंधानमक, जवाखार, सज्जी और कालाजीरा इनके दोदो तोले चूर्णको डालकर उत्तम प्रकार घृतको सिद्ध करे । यह घृत नित्यप्रति सेवन करनेसे प्रसूतिरोग, संग्रहणी, पाण्डु और अनेकप्रकारके अर्शादिविकारोंको तत्काल नष्ट करता है और अग्निको दीपन करता है । तथा स्त्रियोंके स्तन्य ( दूध ) को शुद्ध करता ॥ ९०–९३ ॥
सूतिकादशमूलतै ।
शालपर्णी पृश्निपर्णी बृहतीद्वयगोक्षुरम् ।
दासी प्रसारणी विश्वं गुडूची मुस्तकं तथा ॥ ९४ ॥
एतानि समभागानि प्रस्थं च कटुतैलकम् ।
चतुर्गुणं पयो दत्त्वा शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥
निहन्ति सूतिकारोगं ज्वरदाहसमन्वितम् ॥ ९५ ॥
शालपर्णी, पृश्निपर्णी, बडीकटैरी, गोखुरू, पीलीकटसरैया, प्रसारणी, सोंठ, गिलोय और नागरमोथा इनको समान भाग मिश्रित १०० पल लेकर ६० सेर जलमें पकावे । अर्द्धावशेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर उसमें कडवातैल १ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ और उक्त औषधियोंका कल्क १ सेर डालकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे । इस तेलको मर्दन करनेसे ज्वर और दाहसहित सूतिकारोग नष्ट होता है ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां सूतिकारोगचिकित्सा ।