भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1320, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें१२८८ भैषज्यरत्नावली । [ स्तनरोग-
स्तनरोगकी चिकित्सा ।
वनकार्पासकेक्षूणां मूलं सौवीरकेण वा ।
विदारिकन्दं सुरया पिबेद्वा स्तन्यवर्द्धनम् ॥ १ ॥
वनकपासकी जड और ईखकी जडको काँजीमें पीसकर अथवा विदारीकन्दकें चूर्णको मद्यके साथ पान करनेसे स्तनोंमें दूध बढता है ॥ १ ॥
शालितण्डुलचूर्णस्य पानं दुग्धेन वर्द्धयेत् ।
स्तन्यं सप्ताहतः क्षीरसेविन्यास्तु न संशयः ॥ २ ॥
दूधके साथ शालिचावलोंके चूर्णको पान करे और दूध भातका भोजन करे तो सात दिनमें ही स्तनोंमें दूधकी वृद्धि होती है ॥ २ ॥
हरिद्रादिं वचादिं वा पिबेत्स्तन्यविवृद्धये ॥ ३ ॥
स्तनोंमें दुग्धवृद्धि करनेके लिये हरिद्रादि या वचादि क्वाथ पान करे ॥ २ ॥
तत्र वातात्मके स्तन्ये दशमूलीजलं पिबेत् ।
पित्तदुष्टेऽमृताभीरुपटोलं निम्बचन्दनम् ॥
धात्री कुमारश्च पिबेत्क्वाथयित्वा सशारिवाम् ॥ ४ ॥
वातजनित स्तनरोगमें दशमूलके काढेको पीवे, पित्तज स्तनरोगमें गिलोय, शतावर, परवल, नीमकी छाल, लालचन्दन और अनन्तमूल इनका क्वाथ बनाकर धाय और बालकको पिलाना चाहिये ॥ ४ ॥
कफे वा त्रिफला मुस्ता भूनिम्बं कटुरोहिणी ।
भार्ङ्गीदारुवचापाठाः पिबेत्सातिविषाः शृताः ।
धात्रीस्तन्यविवृद्धयर्थं मुद्गयूषरसाशना ॥ ५ ॥
कफजन्य स्तनरोगमें त्रिफला, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, भारँगी, देवदारु, वच, पाठ और अतीस इनका क्वाथ बनाकर पान करे और मूँगके यूषका भोजन करे तो धायके स्तनोंमें दूधकी वृद्धि होती है ॥ ५ ॥
कुक्कुरमेञ्चुकमूलं चर्वितमास्ये विधारितं जयति ।
सप्ताहात्स्तनकीलं स्तन्यं चैकान्ततः कुरुते ॥ ६ ॥
गंगेरनकी जडको चाबकर मुखमें धारण करनेसे सात दिनके भीतर ही स्तनोंकी कील निकलकर दूधकी वृद्धि होती है ॥ ६ ॥