भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । [ १२८९
शोथं स्तनोत्थितमवेक्ष्य भिषग्विद्ध्याद्विद्रधावभि-
हितं बहुधा विधानम्। आमे विदह्यति तथैव गते च
पाकं तस्याः स्तनौ सततमैव हि निर्दुहीत ॥ ७ ॥
स्त्रीके स्तनोंमें सूजन होजानेपर वैद्य प्रायः विद्रधिरोगकी समान चिकित्सा करें और सूजनकी अपक्व अथवा पक्व अवस्थामें दाह होती हो तो भी उसके स्तनोंमेंसे दूध निकाल देवे ॥ ७ ॥
विशालमूललेपं तु हन्ति पीडां स्तनोत्थिताम् ।
निशाकनकफलाभ्यां लेपश्चापि स्तनार्त्तिहा ॥ ८ ॥
इन्द्रायणकी जड, हल्दी और धतूरेके फल इन सबको एकत्र पीसकर लेप करनेसे स्तनजन्य पीडा दूर होती है ॥ ८ ॥
मूषिकवसया शूकरमहिषगजमांसचूर्णयुतया ।
अभ्यङ्गमर्दनाभ्यां सुकठिनपीनस्तनौ भवतः ॥ ९ ॥
सूअर, भैंसा और हाथीके मांसके चूर्णको चूहेकी चर्बीमें मिलाकर स्तनोंमें मालिश और लेप करनेसे स्त्रीके स्तन अत्यन्त कठिन तथा स्थूल होते हैं ॥ ९ ॥
महिषीभवनवनीतं व्याधिबलोश्रा तथैव नागबला ।
पिष्ट्वा मर्दनयोगात्पीनं कठिनं स्तनं कुरुते ॥ १० ॥
भैंसका नैनीघी, कूठ, खिरैंटी, वच और गंगेरन इनको एकत्र पीसकर मालिश करनेसे स्तन कठिन और स्थूल होते हैं ॥ १० ॥
प्रथमत्तौ तण्डुलाम्भो नस्यं कुर्यात्स्तनौ स्थिरौ ।
पहलेकी ऋतुकालमें चावलोंके जलकी नास लेनेसे स्तन स्थिर होजाते हैं ॥
गोमहिषीघृतसहितं तैलं श्यामाकृताञ्जलिवचाभिः ।
त्रिकटुनिशाभिः सिद्धं नस्यं स्तनवर्धनं परम् ॥ ११ ॥
गोघृत, भैंसका घी और तिलका तेल ये समान भाग मिलित एक सेर, कल्ककें लिये फूलप्रियंगु, लज्जावन्ती, वच, सोंठ, मिरच, पीपल और हल्दी इनको समान भाग मिश्रित ( आधसेर और ) दो सेर लेवे । सबको यथाविधि मिलाकर तेलकों सिद्ध करे । यह तेल नस्यद्वारा प्रयोग करनेसे स्तनोंको बढातीहै ॥
काशीशाद्यतैल ।
काशीश तुरगगन्धाशावरगजपिप्पलीविपक्वेन ।
तैलेन यान्ति वृद्धिं स्तनकर्णवराङ्गलिङ्गानि ॥ १२ ॥