भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1322, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२९० | भैषज्यरत्नावली । | [ बालरोग- |
|---|
कसीस, असगन्ध, लोध और गजपीपल इनके कल्कद्वारा उत्तम विधिसे तेलको सिद्ध कर मर्दन करनेसे स्तन, कान, योनि और लिङ्गकी वृद्धि होतीहै ॥
श्रीपर्णीतैल ।
श्रीपर्णीरसकल्काभ्यां तैलं सिद्धं तिलोद्भवम् ।
तत्तैलं तूलकेनैव स्तनस्योपरि धारयेत् ॥
पतितावुत्थितौ स्त्रीणां भवेतां च पयोधरौ ॥ १३ ॥
कुम्मेरकी जडके क्वाथ और कल्कद्वारा तिलके तेलको विधिपूर्वक पकावे । उस तेलको रुईके फोयेसे स्तनोंपर लगानेसे गिरेहुए स्तन फिर उन्नत होजातेहैं ॥
इति भैषज्यरत्नावल्यां स्तनरोगचिकित्सा ।
बालरोगकी चिकित्सा ।
त्रिविधः कथितो बालः क्षीरान्नोभयवर्त्तकः ।
स्वास्थ्यं ताभ्यामदुष्टाभ्यां दुष्टाभ्यां रोगसम्भवः ॥१॥
क्षीरपाय्यौषधं धात्र्याः क्षीरान्नादस्य चोभयोः ।
अन्नेन वा शिशौ देयं भेषजं भिषजा सदा ॥ २ ॥
बालक तीन प्रकारके होते हैं, जैसे—एक दूध पीनेवाले, दूसरे—दूध और अन्न खानेवाले और तीसरे—केवल अन्नको खानेवाले । दूषित दूध और दूषित अन्नके होनेसे ही बालक रोगी होते हैं और दूध तथा अन्नके निर्दोष होनेसे बालक स्वस्थ रहते हैं । दूध पीनेवाले बालकको रोग हो तो धाय (बालकको दूध पिलानेवाली) को औषधि सेवन करावे और दूधपायी तथा अन्नभोजी बालकके रोग होनेपर बालक और धाय दोनोंको औषधि सेवन करावे । पर अन्नखानेवाले बालकको रोग होनेपर धायको कदापि औषधि सेवन न करावे । अन्नके साथ औषध मिला-कर बालकको सेवन करावे ॥१॥२॥
मात्रया लङ्घयेद्धात्रीं शिशोर्नैष्टं विशोषणम् ।
सर्वे निवार्यते बाले स्तन्यं तु न निवार्यते ॥ ३ ॥
बालककें रोग उत्पन्न होनेपर आवश्यकतानुसार धायको लंघन करावे और बालकको लंघन या दस्त कदापि न करावे। बालकको अन्यान्य सर्वप्रकारकी वस्तु-ओंसे वर्जित करे; किन्तु माताका दूध पीना कभी बन्द न करे ॥ ३ ॥