भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1324
१२९२भैषज्यरत्नावली ।[ बालरोग-

मृत्पिण्डेनाभितप्तेन क्षीरसिक्तेन सोष्मणा ।
स्वेदयेदुत्थितां नाभिं शोथस्तेनोपशाम्यति ॥ १० ॥
मिट्टीके ढेलेको तपाकर और गरम दूधमें डालकर उससे सुहाता २ नाभिपर स्वेद देवे तो बालककी नाभिकी सूजन दूर होती है ॥ १० ॥

नाभिपाके निशालोध्रप्रियङ्गुमधुकैः शृतम् ।
तैलमभ्यञ्जने शस्तमेभिर्वाप्यवचूर्णनम् ॥ ११ ॥
बालककी नाभि पकजानेपर हल्दी, लोध, फूलप्रियंगु और मुलहठी इनके कल्क-द्वारा तैलको पकाकर नाभिपर मालिश करे अथवा उक्त औषधियोंके चूर्णको नाभिपर घर्षण करे ॥ ११ ॥

सोमग्रहणे विधिवत्केकिशिखामूलमुद्धृतं बद्धम् ।
जघनेऽथ कन्धरायां क्षपयत्यहिण्डिकां नियतम् ॥ १२ ॥
चन्द्रग्रहण होनेपर चिरचिटेकी जड उखाड बालककी जाँघ अथवा गर्दनमें बाँध देवे तो अहिण्डिकारोग निस्सन्देह दूर होता है ॥ १२ ॥

सप्तदलपुष्पमरिचं पिष्टं गोरोचनासहितम् ।
पीतं तद्वत्तण्डुलभक्तकृतो दग्धपिष्टकप्राशः १३ ॥
सतौनेके फूल, मिरच और गोरोचन इनको एकत्र पीसकर पान करावे अथवा अन्नके साथ चावलोंको पीसकर केलेके पत्तेपर रख कुशासे बाँधकर दग्ध करके भक्षण करावे तो अहिण्डिकारोग नष्ट होता है ॥ १३ ॥

हरिद्राद्वयष्ट्याह्वासिंहीशक्रयवैः कृतः ।
शिशोर्ज्वरातिसारघ्नः कषायः स्तन्यदोषनुत् ॥ १४ ॥
हल्दी, दारुहल्दी, मुलहठी, कटेरी, इंद्रजौ इनका क्वाथ बनाकर पान करानेसे बालकका ज्वर, अतीसार (दस्त) और धायके स्तन्यदोषादिविकार जाते हैं ॥१४॥

रजनी दारु सरलं श्रेयसी बृहतीद्वयम् ।
पृश्निपर्णी शातह्ला च लीढं माक्षिकसर्पिषा ॥ १५ ॥
ग्रहणीदीपनं हन्ति मारुतार्त्तिं सकामलाम् ।
ज्वरातीसारपाण्डुघ्नं बालानां सर्वरोगजित् ॥ १६ ॥
हल्दी, देवदारु, धूपसरल, गजपीपल, कटेरी, बडीकटेरी, पृश्निपर्णी और सोया इनके चूर्णको समान भाग लेकर शहद और घीमें मर्दन करके बालकोंको