भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1325

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता १२९३

चटानेसे ग्रहणी, वातरोग, कामला, ज्वर, दस्त, पाण्डु और अन्यान्य सर्वप्रकारके विकार नष्ट होते हैं तथा अग्नि दीपन होती है ॥१५-१६॥

मिषीकृष्णाञ्जनं लाजा शृङ्गीमरिचमाक्षिकैः । लेहः शिशोर्विधातव्यश्छर्द्दिकासज्वरापहः ॥ १७ ॥

सौंफ, पीपल, रसौत, खीलोंका चूर्ण, काकड़ासिङ्गी और काली मिरच इनके चूर्णको समान भाग लेकर शहदमें खरलकरके भक्षण करानेसे बालकके वमन, खाँसी और ज्वरादिविकार नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥

पीतं पीतं वमेद्यस्तु स्तन्यं तन्मधुसर्पिषा । द्विवार्त्ताकीफलरसं पञ्चकोलं च लेहयेत् ॥ १८ ॥

जो बालक दूधको पीते २ ही डालदेवे तो उसको बडीकटेरी और कटेरीके फलोंका रस घी और शहदके साथ मिलाकर पान करे अथवा पञ्चकोलका चूर्ण घी और शहदमें मिश्रितकर चटावे ॥ १८ ॥

आम्रास्थिलाजसिन्धूत्थैर्लेहः क्षौद्रेण छर्द्दिनुत् ॥ १९ ॥

आमकी गुठलीकी गिरी, खीलें और सैंधानमक इनके चूर्णको शहदके साथ मिलाकर चटानेसे वमन (कै) होना दूर होता है ॥ १९ ॥

पिप्पलीमरिचानां च चूर्णं समधुशर्करम् । रसेन मातुलुङ्गस्य हिक्काच्छर्द्दिनिवारणम् ॥ २० ॥

पीपल, काली मिरच इनके चूर्णको शहद और खाँडमें मिलाकर बिजोरानींबुके रसके साथ पान करानेसे हिचकी और वमन होना बन्द होता है ॥२०॥

पेठीपाठामूलं जम्बूसहकारवल्कलतः । इत्येकशश्च पिण्डो विधृतो हृन्नाभिताल्वादौ ॥ छर्द्यतिसारजवेगं प्रबलं धत्ते तदेव नियमेन ॥ २१ ॥

पेटारीवृक्ष, पाठकी जड, जामुनकी छाल और आमकी छाल, इनमेंसे किसीएक चीजको पीसकर गोलासा बनालो । उसको बालकके हृदय, नाभि और तालुआदि स्थानोंमें रखनेसे वमन और अतीसारका प्रबल वेगसहित होना दूर होता है ॥२१॥

पत्रैर्बदरचाङ्गेरीकाकमाचीकपित्थजैः । शिशोरुग्वम्यतीसारनाशनं मूर्द्धलेपनम् ॥ २२ ॥

बेर, अम्ल नोनिया, मकोय और कैथ इनके पत्तोंको एकत्र पीसकर मस्तकपर लेपकरनेसे बालकके कै और दस्त होना आदि विकार नष्ट होते हैं ॥२२॥