भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 1329, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२९७
तदा सञ्जायते तत्र जलौकोदरसन्निभः ।
व्रणःसदाहो व्यक्तोष्मा तदाऽस्य स्याज्ज्वरः परः ॥४१॥
हरितं पीतकं वापि वर्चस्तेन भवेद् ध्रुवम् ।
व्रणः पश्चाद्रुजो नाम व्याधिः परमदारुणः ॥ ४२ ॥
दूषित अन्नादिका सेवन करनेसे माताका दूध दूषित होजाता है । उस दूषित दूध को पीनेसे बालकका पित्त कुपित होकर गुदामें पहुँचकर जोंकके उदरकी समान लाल लाल व्रण उत्पन्न करता है । उस व्रणमें-गुदामें दाह, सन्ताप और ज्वर होता है और हरा अथवा पीला मल निकलता है । इस रोगका पश्चाद्रूण नाम है । यह व्याधि बालकोंके लिये अतिभयंकर है ॥४०-४२॥
चन्दनं सारिवे द्वे च शङ्खिनीति समायुतैः ।
पश्चाद्रुजे प्रलेपोऽयमवलेहस्तु शस्यते ॥४३॥
पश्चाद्रूणरोगमें लालचन्दन, उसवा, अनन्तमूल, और शङ्खपुष्पी इन औषधियोंके द्वारा प्रलेप और अवलेह सिद्ध कर प्रयोग करना चाहिये ॥ ४३ ॥
कणोषणसिताक्षौद्रसूक्ष्मैलासैन्धवैः कृतः ।
मूत्रग्रहे प्रयोक्तव्यः शिशूनां लेह उत्तमः ॥ ४४ ॥
पीपल, कालीमिरच, मिश्री, शहद, छोटी इलायची और सेंधानमक इनका अवलेह बनाकर बालकके मूत्रावरोधमें प्रयोग करना उत्तम है ॥ ४४ ॥
घृतेन सिन्धुविश्वैलाहिङ्गुभार्ङ्गीरजो लिहन् ।
आनाहं वातिकं शूलं जयेत्तोयेन वा शिशुः ॥ ४५ ॥
सेंधानमक, सोंठ, छोटी इलायची, हींग और भारंगी इनके समान भाग मिश्रित चूर्णको घीमें मिलाकर अथवा मन्दोष्ण जलके साथ सेवन करनेसे बालकका वातज शूल और आनाहरोग दूर होता है ॥ ४५ ॥
हरीतकीवचाकुष्ठकल्कं माक्षिकसंयुतम् ।
पीत्वा कुमारः स्तन्येन मुच्यते तालुपातनात् ॥ ४६ ॥
हरड, वच और कूठ इनको एकत्र पीसकर शहदमें मिलाकर माताके दूधके साथ पान करानेसे बालक तालुपातरोगसे मुक्त होता है ॥ ४६ ॥
मुखपाके तु बालानां साम्रसारमयोरजः ।
गैरिकं क्षौद्रसंयुक्तं भेषजं सरसाञ्जनम् ॥ ४७ ॥
८२