भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १२९६ | भैषज्यरत्नावली । | [ बालरोग- |
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लाजाः सयष्टिमधुकशर्कराः क्षौद्रमेव च ।
तण्डुलोदकसंयुक्तं क्षिप्रं हन्ति प्रवाहिकाम् ॥ ३५ ॥
खीलें, मुलहठी, चीनी और शहद इन सबको एकत्र मर्दनकर चावलोंके जलके साथ बालकको पान करानेसे प्रवाहिकारोग तत्काल नाश होता है ॥ ३५ ॥
अङ्कोटमूलमथवा तण्डुलसलिलेन वटजमूलं वा ।
पीतं हन्त्यतिसारं ग्रहणीरोगं च दुर्वारम् ॥ ३६ ॥
ढेरावृक्षकी जड अथवा वडकी जडको चावलोंके पानीके साथ पीसकर पान करानेसे बालकके दस्त और संग्रहणीरोग नष्ट होते हैं ॥ ३६ ॥
मरिचमहौषधकुटजं द्विगुणीकृतमुत्तरोत्तरं क्रमशः ।
गुडतक्रयुक्तमेतद्ग्रहणीरोगं निहन्त्याशु ॥ ३७ ॥
काली मिरच एक भाग, सोंठ दो भाग और कुडेकी छाल ४ भाग इनको यथाक्रमसे लेकर गुड और मट्ठेके साथ खरल करके पान करानेसे संग्रहणी तत्काल नष्ट होती है ॥ ३७ ॥
बिल्वशक्राम्बुमोचाब्दसिद्धमाजं पयः शिशोः ।
सामां सरक्तां ग्रहणीं पीतं हन्यात्त्रिरात्रितः ॥ ३८ ॥
बेलगिरी, इन्द्रजौ, सुगन्धवाला, मोचरस और नागरमोथा इन सबको समान भाग मिलाकर दो तोले परिमाण ले १६ तोले बकरीके दूध और एक सेर जलमें पकावे। जब दूधमात्र शेष रहजाय तब उस दूधको सेवन करानेसे बालकके आम-सहित और रक्तसहित संग्रहणीरोग तीन दिनमें ही नष्ट होता है ॥ ३८ ॥
तद्वदजाक्षीरसमो रसो जम्बूत्वगुद्भवः ॥
बकरीका दूध और जामुनकी छालका रस इन दोनोंको समान भाग ले एकत्र मिश्रितकर पान करानेसे बालककी संग्रहणी नष्ट होती है ॥
गुदपाके तु बालानां पित्तघ्नीं कारयेत् क्रियाम् ।
रसाञ्जनं विशेषेण पानालेपनायोर्हितम् ॥ ३९ ॥
बालककी गुदा पकगई हो तो पित्तनाशक चिकित्सा करे और रसौतको पीस-कर गुदापर लेप करे तथा पान करावे ॥ ३९ ॥
दुष्टमन्नादिभिर्मातुः स्तन्यं संपिबतः शिशोः ।
यदा प्रकुपितं पित्तं गुदं समभिधावति ॥ ४० ॥