भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२९५

सितजीरकसर्ज्जचूर्णं बिल्वदलोत्थाम्बुमिश्रितं पीतम् । हन्त्यामरक्तशूलं गुडसहितं श्वेतसर्जो वा ॥ २९ ॥ सफेद जीरा और राल इनके चूर्णको बेलपत्रीके रसमें अथवा केवल श्वेतरालके चूर्णको गुडके साथ मर्दन करके बालकको सेवन करानेसे आमरक्त और उसकी पीडा नष्ट होती है ॥ २९ ॥

समङ्गा धातकी पद्मं वयस्था कच्छुरा तथा । पिष्टैरेतैर्यवागूः स्यादतीसारविनाशिनी ॥ ३० ॥ वराहाक्रान्ता, धायके फूल, कमलकेशर, गिलोय और कौंछकी जड इनको एकत्र पीसकर इनकी यवागू बनावे। यह यवागू बालकको पान करानेसे अतीसारको नष्ट करती है ॥ ३० ॥

बिल्वमूलकषायेण लाजांश्चैव सशर्करान् । आलोड्य पाययेद्बालं छर्द्यतीसारनाशनम् ॥ ३१ ॥ बेलकी जडके क्वाथमें खीलोंका चूर्ण और चीनी मिलाकर बालकको पिलानेसे वमन और अतीसार दूर होते हैं ॥ ३१ ॥

कल्कः प्रियङ्गुकोलास्थिमध्यमुस्तरसाम्जनैः । क्षौद्रलीढः कुमारस्य छर्दितृष्णातिसारनुत् ॥ ३२ ॥ फूलप्रियंगु, बेरकी गुठलीकी भींग, नागरमोथा और रसौत इन सबके चूर्णको एकत्र शहदके साथ खरल करके बालकको चटानेसे कै प्यास और दस्त होने बन्द होते हैं ॥ ३२ ॥

मोचरसं समङ्गा च धातकी पद्मकेशरम् । पिष्टैरेतैर्यवागूः स्याद्रक्तातीसारनाशिनी ॥ ३३ ॥ मोचरस, वराहाक्रान्ता, धायके फूल और कमलकेशर इन सबको एकत्र पीस कर इनके द्वारा यवागू बनाकर बालकको सेवन करावे तो रक्तातिसार नष्ट होय ॥ ३३ ॥

लेहस्तैलसिताक्षौद्रतिलयष्ट्याह्वकल्कितः । बालस्य रुन्ध्यान्नियतं रक्तस्रावं प्रवाहिकाम् ॥ ३४ ॥ तिलका तेल, मिश्री, शहद, तिल और मुलहठी इन सबको एकत्र पीसकर बालकको सेवन करानेसे रक्तस्राव और प्रवाहिकारोग निश्चय दूर होते हैं ॥ ३४ ॥