भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । १२९९
चित्रकं शृङ्गवेरं च तथा दन्ती गवाक्ष्यपि । चूर्णं कृत्वा तु सर्वेषां सुखोष्णेनाम्बुना पिबेत् ॥ कासं श्वासमथो हिक्कां कुमाराणां प्रणाशयेत् ॥ ५४ ॥ चीतेकी जड, सोंठ, दन्तीकी जड और इन्द्रायनकी जड इनके चूर्णको एकत्र पीसकर सुखोष्ण जलके साथ पीनेसे बालकोंकी खाँसी, श्वास और हिचकी आना बन्द होती हैं ॥ ५४ ॥
द्राक्षायासाभयाकृष्णाचूर्णं सक्षौद्रसर्पिषा । लीढं कासं निहन्त्याशु श्वासं च तमकं तथा ॥ ५५ ॥ दाख, धमासा, हरड और पीपल इनके चूर्णको शहद और घीके साथ मिलाकर सेवन करनेसे बालकोंकी खाँसी, श्वास और तमकरोग शीघ्र नष्ट होताहै ॥५५॥
दाडिमस्य च बीजानि जीरकं नागकेशरम् । चूर्णितं शर्कराक्षौद्रलीढं तृष्णानिवारणम् ॥ ५६ ॥ अनारके बीज, जीरा और नागकेशर इनको एकत्र पीसकर चीनी और शहदमें मिलाकर चटानेसे बालकोंकी तृषा निवारण होती है ॥ ५६ ॥
मायूरपक्षभस्मप्युषितजलं तेन भावितं पेयम् । तृष्णाघ्नं वटकाष्ठजभस्मजलं वक्त्रशोषजिद्वक्त्रे ॥ ५७ ॥ मोरपंखकी भस्मको जलमें भिजोकर अगलेदिन वह बासी जल बालकको पान करावे अथवा वडकी छालकी भस्म जलमें भिजोकर उसके बासी जलको पान करावें तो बालककी तृषा और मुखशोषरोग नष्ट होताहै ॥ ५७ ॥
पिष्टैश्छागेन पयसा दार्वीमुस्तकगैरिकैः । बहिरालेपनं शस्तं शिशोर्नेत्रामयार्त्तिजित् ॥ ५८ ॥ दारुहल्दी, नागरमोथा और गेरू इनको बकरीके दूधमें पीसकर नेत्रोंके बाहर पलकोंपर लेप करनेसे बालकोंके नेत्ररोगकी पीडा शान्त होती है ॥५८॥
मनःशिला शङ्खनाभिः पिप्पल्योऽथ रसाञ्जनम् । वर्त्तिः क्षौद्रेण संयुक्ता बाले सर्वाक्षिरोगनुत् ॥ ५९ ॥ मैनसिल, शङ्खनाभि, पीपल और रसौत इनको समान भाग लेकर शहदकेसाथ खरल करके इनकी बत्ती बनालेवे । इस बत्तीको बालककी आँखोंमें आँजनेसे सर्वप्रकारके नेत्ररोग नष्ट होते हैं ॥५९॥