भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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पृष्ठ 1332

१३०० | भैषज्यरत्नावली । | [ बालरोग-

मातृस्तन्यकटुस्नेहकाञ्जिकैर्भावितो जयेत् ।
स्वेदाद्दीपशिखोत्तप्तो नेत्रामयमलक्तकः ॥ ६० ॥
माताका दूध, कडवा तेल और महावर इनको क्रमसे ७ बार काँजीमें भावना देकर धूपमें सुखा लेवे । फिर दीपककी लोयपर गरम करके उससे नेत्रोंमें स्वेद देनेसे बालकोंका कुकूणनामक नेत्ररोग शमन होताहै ॥६०॥

शुण्ठीभृङ्गनिशाकल्कः पुटपाकः ससैन्धवः ।
कुकूणकेऽक्षिरोगेषु तद्रसाश्च्योतनं हितम् ॥ ६१ ॥
सोंठ, भाँगरा और हल्दी इनको एकत्र पुटपाककर भस्म करलेवे । फिर उस भस्मके जलमें सैंधानमक डालकर उस रसको कुकूणक नामक नेत्ररोगमें नेत्रोंके भीतर टपकाना हितकर है ॥६१॥

कृमिघ्नालशिला दार्बी लाक्षा काञ्चनगैरिकः ।
चूर्णाञ्जनं कुकूणे स्याच्छिशूनां पोथकीषु च ॥ ६२ ॥
वायविडङ्ग, हरिताल, मैनसिल, दारुहल्दी, लाख और लालगेरू इनको समानांश ले बारीक चूर्ण करलेवे । फिर उस चूर्णको शहदमें मिलाकर सलाईसे आँखोंमें आँजे तो बालकोंके कुकूणक और पोथकीमें शीघ्र लाभ होताहै ॥६२॥

सुदर्शनामूलचूर्णाञ्जनं स्यात्तु कुकूणके ॥
कुकूणकरोगमें सुदर्शनवृक्षकी जडका चूर्ण आँजनेसे आराम होताहै ॥

गृहधूम निशाकुष्ठवाजिकेन्द्रयवैः शिशोः ।
लेपस्तके्रण हन्त्याशु सिध्मपामाविचर्चिकाः ॥ ६३ ॥
घरका धुआँ, हल्दी, कूठ, असगन्ध और इन्द्रजौ इनको समान भाग ले सबको मह्ठेके साथ एकत्र पीसकर लेप करनेसे बालकके सिध्म, खुजली और विचर्चिकादि विकार बहुत जल्द नष्ट होते हैं ॥६३॥

सारिवादि ।
सारिवातिललोध्राणां कषायो मधुकस्य च ।
संस्राविणि मुखे शस्तो धावनार्थं शिशोः सदा ॥ ६४ ॥
अनन्तमूल, तिल, लोध और मुलहठी इनका काढा बनाकर उससे मुख धोवे तो बालकका मुखस्रावरोग नष्ट होताहै ॥६४॥

मुस्तकादि ।
मुस्तकातिविषाशुण्ठीबालकेन्द्रयवैः कृतम् ।
क्वाथं शिशुः पिबेत्प्रातः सर्वातीसारनाशनम् ॥ ६५ ॥