भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०३
उदकमञ्जरीरस ।
सूतो गन्धष्टङ्कणः सोषणः स्या-
देतैस्तुल्या शर्करा३ मत्स्यपित्तैः ।
भूयोभूयो भावयेच्च त्रिरात्रं
वल्लो देयः शृङ्गवेरस्य वारि ॥ ९४ ॥
सम्यक् तापे वारि भक्तं सतक्रं
वृन्ताकाढ्यं पथ्यमत्र प्रदिष्टम् ।
अह्ना चोग्रं हन्ति सामं प्रभावात्
पित्ताधिक्ये मूर्ध्नि वारिप्रयोगः ॥ ९५ ॥
पारा और गन्धककी कज्जली, सुहागा और मिरच ये सब समान भाग और सबके बराबर शुद्ध मीठा तेलिया लेकर समस्त औषधियोंको एकत्र पीसकर रोहू-मछलीके पित्तमें तीन दिनतक बारबार भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे इसकी एक एक गोली अदरखके रस और मधुके अनुपानसे सेवन करानी चाहिये। यदि औषधि सेवन करनेपर रोगीको अधिक गरमी मालूम हो तो तक्रके साथ भातका माँड और बैंगनोंके शाकका पथ्य देवे। पित्तकी अधिकता होनेपर सिरपर शीतल जलकी धारा छोडे। इस प्रकारं इस रसको सेवन करनेसे आमयुक्त उग्रज्वर एक दिनमें ही नष्ट होजाताहै ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
अचिन्त्यशक्तिरस
रसगन्धकयोर्ग्राह्यं प्रत्येकं माषकद्वयम् ।
भृङ्गकेशारख्यनिर्गुण्डी मण्डूकीपत्रसुन्दरः ॥
श्वेतापराजितामूलं शालिं च कणमारिषम् ॥ ९६ ॥
सूर्यावर्त्तः सितश्चैषां चतुर्माषकसम्मितैः ।
प्रत्येकं स्वरसैः खल्ले शिलायामवधानतः ॥
स्वर्णमाक्षिकमाषं च दत्त्वा मरिचमाषकम् ॥ ९७ ॥
नेपालताम्रदण्डेन घृष्ट्वा तत्कज्जलद्युति ।
वटी मुद्गोपमा कार्या छायाशुष्का तु रक्षिता ॥ ९८ ॥
३ शर्करा-अत्र विषम् ।