भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

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१०४भैषज्यरत्नावली ।[ रस-

पारा और गन्धक प्रत्येक दो दो माशे लेकर कज्जली करलेवे । उस कज्जलीको भाँगरा, कुकुरभाँगरा, सिह्नाळु, ब्राह्मी, ग्रीष्मसुन्दर, हुरहुर, श्वेत अपराजिताकी जड, शान्तिशाक, चौलाईका शाक और श्वेत हुलहुल इन प्रत्येकके चार चार माशे स्वरसके साथ पत्थरके खरलमें उत्तम प्रकारसे घोटे फिर उसमें सोनामाखी १ माशा और काली मिरचोंका चूर्ण १ माशा मिलाकर ताँबेके पात्रमें डालकर ताँबेकी मूसलीसे खूब अच्छे प्रकारसे खरल करे, जब औषधि घुटकर कज्जलके समान कान्तियुक्त होजाय तब मूँगके बराबर गोलियाँ बनाकर और छायामें सुखाकर शीशीमें भरकर रखदेवे ॥ ९६-९८ ॥

प्रथमे वटिकास्तिस्रः कृत्वा नवशरावके ।
ततः खसर्पणं सूर्य्यं पूजयित्वा प्रणम्य च ॥
वारिणा गोलयित्वा तु पातुं देयं च रोगिणे ॥ ९९ ॥
स्वेदोपवासचरिते क्लान्ते चाल्पबले तथा ।
द्वितीयेऽह्नि वटीयुग्मं वटीमेकां तृतीयके ।
यावन्त्यो वटिका देयास्तावज्जलशरावकम् ॥ १०० ॥
तृषायां च रसं दद्याज्जाङ्गलानां जलं तृषि ।
लुलायदधिसंयुक्तं भक्तं योज्यं यथेप्सितम् ॥ १ ॥
लावपक्षिरसो देयः संस्कृतः सैन्धवादिभिः ।
पथ्यमग्निबलं वीक्ष्य वारिभक्तरसं तथा ॥
शिरश्चलनशूलादौ तल नारायणादि च ॥ २ ॥

इनमेंसे पहले दिन तीन गोलियोंको एक नये सकोरेमें रखकर आकाशमें भ्रमण करनेवाले सूर्यदेवका पूजन और प्रणाम करके गोलियोंको शीतल जलमें घोलकर रोगीको पान करनेके लिये देवे । अत्यन्त स्वेद निकलने और उपवास करनेसे क्लान्त और बलहीन होनेपर रोगीको दूसरे दिन दो गोली और तीसरे दिन एक गोली उक्त विधिसे सेवन करावे,रोगीको जितनी गोलियाँ सेवन करावे उतने ही सकोरे शीतलजल पिलावे और तृषा लगनेपर जाङ्गलजीवोंका मांसरस और शीतलजल पान करावे । इसपर भैंसके ताजे दहीके साथ भातका आहार यथेच्छरूपसे देवे और सैंधानमक आदि मसालोंके द्वारा संस्कार कियाहुआ लावापक्षीका मांसरस तथा भातका माँड जठराग्निके बलाबलको विचारकर पथ्यरूपसे देवे । शिरःकम्प और शिरःशूल आदि उपद्रवोंके होनेपर शिरपर नारायणतेल आदिकी मालिश करावे ॥ ९८-१०२ ॥