भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषाटीकासहिता । १०५

सन्निपातादिज्वरोंमें—

मोहान्धसूर्यरस ।

गन्धेशौ लशुनाम्भोभिर्मर्दयेद्याममात्रकम् ।
तस्योदकेन संयुक्तं नस्यं तत्प्रतिबोधयेत् ॥
मरिचेन समायुक्तं हन्ति तन्द्राप्रलापकम् ॥ १०३ ॥

गन्धक और पारा दोनोंको समान भाग लेकर लहसुनके रसमें एक प्रहरतक घोटे उसको लहसुनके रसमें मिलाकर नस्य (देवे) तो सन्निपातज्वरमें चैतन्यलाभ होता है और इसको मिरचोंके चूर्णके साथ मिलाकर नस्य देनेसे तन्द्रा तथा प्रलाप दूर होता है ॥ १०३ ॥

कुलवधूवटी ।

शुद्धसूतं मृत नागं मृतं ताम्रं मनःशिलाम् ।
तुत्थकं तुल्यतुल्यांशं दिनमेकं विमर्दयेत् ॥ १०४ ॥
रसैश्चोत्तरवारुण्याश्चणमात्रा वटी कृता ।
सन्निपातं निहन्त्याशु नस्यमात्रेण दारुणम् ॥
एषा कुलवधूर्नाम जले घृष्ट्वा प्रदापयेत् ॥ १०५ ॥

शुद्ध पारा, सीसेकी भस्म, ताम्रभस्म, मैनसिल और तूतिया सबको समान भाग लेकर इन्द्रायनके रसमें एक दिनतक खरल करके चनेके बराबर गोलियाँ बनालेवे । इन गोलियोंको जलमें घिसकर नस्य देनेसे दारुण सन्निपातज्वर शीघ्र दूर होता है । इसको कुलवधूवटी कहते हैं ॥ १०४ ॥ १०५ ॥

नस्यभैरव ।

मृतसूतार्कतीक्ष्णाग्नि टङ्कणं खर्परं समम् ।
सव्योषमर्कदुग्धेन दिनं सम्मर्दयेद् दृढम् ॥
अर्कक्षीरयुतं नस्यं सन्निपातहरं परम् ॥ १०६ ॥

रससिन्दूर, ताम्रभस्म, लोहभस्म, चीता, सुहागा, खपरिया, सोंठ, मिरच और पीपल इन सबको समान भाग लेकर एक दिनतक आकके दूधमें उत्तम प्रकारसे खरल करके और आकके दूधमें मिलाकर इसकी नस्य देवे तो सन्निपातज्वर दूर होता है ॥ १०६ ॥

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