भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ भैषज्यरत्नावली । [ रस-
उन्मत्तरस ।
रसं गन्धं च तुल्यांशं धुस्तूरफलजैर्द्रवैः ।
मर्दयेद्दिनमेकं तु तुल्यं त्रिकटुकं क्षिपेत् ॥
उन्मत्ताख्यो रसो नाम नस्ये स्यात्सन्निपातजित् १०७॥
पारे और गन्धकको समान भाग लेकर कज्जली करके धतूरेके फलोंके रसमें एक दिनतक घोटे फिर उसमें समान भाग त्रिकुटेका चूर्ण मिलालेवे। यह उन्मत्तरस नस्यके द्वारा प्रयोग करनेपर सन्निपातज्वरको दूर करता है ॥ १०७ ॥
अञ्जनभैरव ।
सूततीक्ष्णकणागन्धमेकांशं जयपालकम् ।
सर्वैस्त्रिगुणितं जम्भवारीणा च सुपेषितम् ॥
नेत्राञ्जनेन हन्त्याशु सर्वोपद्रवमुद्धतम् ॥ १०८ ॥
पारा, लोहा, पीपल और गन्धक ये प्रत्येक एक एक भाग और जमाल गोटा ३ भाग लेकर सबको जम्बीरीनींबुके रसमें अच्छे प्रकारसे खरल करके नेत्रोंमें आँजनेसे सर्वप्रकारके उपद्रवोंसहित सन्निपातज्वर शीघ्र निवृत्त होता है ॥ १०८ ॥
सौभाग्यवटी ।
सौभाग्यामृतजीरपञ्चलवणव्योषाभयाक्षामला-
निश्चन्द्राभ्रकशुद्धगन्धकरसानेकीकृतान् भावयेत् ।
निर्गुण्डीयुगभृङ्गराजकववृषापामार्गपत्रोल्लसत्-
प्रत्येकस्वरसेन सिद्धवटिका हन्ति त्रिदोषोदयम् ॥ ९ ॥
सुहागा, शुद्ध वत्सनाभ, जीरा, सेंधानमक, कालानमक, समुद्रनमक, साँभरनमक, विडनमक, सोंठ, मिरच, पीपल, हरड, बहेडा, आमला और चन्द्रिकारहित अभ्रककी भस्म ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारे, गन्धककी कज्जली दो भाग लेकर सबको एकत्र खरल करके निर्गुण्डी, भाँगरा, कुकुरभाँगरा, अडूसा और चिरचिटा इन प्रत्येकके पत्तोंके स्वरसमें क्रमसे भावना देकर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बनालेवे ॥ १०९ ॥
येषां शीतमतीव देहमखिलं स्वेदद्रवार्द्रीकृतं
निद्रा घोरतरा समस्तकरणव्यामोहमूढं मनः ।
शूलश्वासबलासकाससहितं मूर्छारुचिस्तृड्ज्वरं
तेषां वै परिहृत्य जीवितमसौ गृह्णाति मृत्योर्मुखात् ॥१०॥