भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३२२ भैषज्यरत्नावली । [ रसायना-
इस प्रकार जो एक वर्षपर्यन्त निरालस्य हो निरन्तर इनको सेवन करे तो वह मनुष्य एक महीनेमें वाचाल, दूसरेमें बल और वर्णकरके युक्त होता है, तीसरे महीनेमें उसका कुष्ठरोग, चौथेमें श्वास और खांसी रोग नष्ट होते हैं, पाँचवेंमें स्त्रियोंको अत्यन्त प्रिय, छठवेंमें बालोंका पकना दूर होता है, सातवेंमें अत्यन्त शोभायमान, आठवेंमें बलवान्, नवेंमें सौवर्षकी आयुवाला, दसवेंमें सुन्दरस्वरवाला, ग्यारहवेंमें महाबलवान् और बारहवें महीनेमें मुक्त होजाता है। इसपर इच्छानुसार आहार और विहार करनेवाला मनुष्य विष्णुके समान पराक्रमी होता है ॥ ४४-४८ ॥
षडूर्मिरहितो देही प्राप्नोति कल्पजीवितम् ।
युवा निरन्तरं तिष्ठेद्यावत्कालं च जीवति ॥ ४८ ॥
भवन्ति सिद्धयोऽष्टाष्टौ याश्चापि परिकीर्तिताः ।
श्रीसिद्धमोदको ह्येष सिद्धादिसुनिषेवितः ॥ ४९ ॥
एवं वह मनुष्य षड् ऊर्मियोंसे रहित होकर एक कल्पपर्यंत जीता है और जबतक जीता है तबतक जवान बना रहता है। इसको सेवन करनेवाले पुरुषको अष्ट सिद्धियें प्राप्त होती हैं। ये श्रीसिद्धमोदक सिद्धादिकोंने सेवन किये हैं ४८॥४९॥
निर्गुण्डीकल्प।
ॐ सिद्धिः पिङ्गलायोगिनीकथितम् । निर्गुण्डीमूलचूर्ण-
मष्टपलं गृहीत्वा षोडशपलमधुमिश्रितं घृतभाण्डे कृत्वा
शरावेण निबिडलेपनं दत्त्वा मर्दयित्वामासमेकं धान्य-
मध्ये स्थापयेत् । तन्मासमेकं भक्षितमात्रेण नरः कनक-
वर्णो गृध्रदृष्टिः सर्वरोगविवर्जितो वलीपलितहीनः
संवत्सरं खादिते चन्द्रार्कं यावज्जीवेद्धृद्धशुक्रः स्त्रीशतं
कामयितुं क्षमो भवति । शाकाम्लं विहाय यथे-
च्छया भोज्यम् ॥
निर्गुण्डीकी जड़के चूर्णको ३२ तोले लेकर ६४ तोले शहदमें मिलाकर घीके चिकने बासनमें भरदेवे। फिर सकोरेसे उस पात्रके मुखको ढककर और मिट्टीसे उसके सन्धिस्थानोंको बन्द करके उसको एकमहीनेतक धानोंके बीचमें गाडकर रक्खे। फिर उसको निकालकर प्रतिदिन प्रातःकाल उचित मात्रासे निरन्तर एक वर्षतक सेवन करनेवाला मनुष्य सुवर्णके समान वर्णवाला गिद्धकीसी दृष्टि-