भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

पृष्ठ 1361, कुल 1416 में से

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पृष्ठ 1361

ऽविकारः ] | भाषाटीकासहिता । | १३२९


कुष्ठमष्टादशाख्यं च प्रमेहान्विंशतिं तथा ॥ ८७ ॥ नाडीव्रणं व्रणं घोरं मूत्रामयभगन्दरम् । श्रीपदं कफवातोत्थं रक्तमांसाश्रितं च यत् ॥ ८८ ॥ मेदोगतं धातुगतं चिरजं कुलसम्भवम् । गलशोथमन्त्रवृद्धिमतीसारं सुदारुणम् ॥ ८९ ॥ आमवातं सर्वरूपं जिह्वास्तम्भं गलग्रहम् । उदरं कर्णनासाक्षिमूखवैकृत्यमेव च ॥ ९० ॥ कासपीनसयक्ष्मांशः स्थौल्यदौर्गन्ध्यनाशनः । सर्वशूलं शिरःशूलं स्त्रीणां गदनिषूदनः ॥ ९१ ॥

यह अठारह प्रकारके कोढ, २० प्रकारके प्रमेह, नासूर, घोर व्रण, मूत्रकृच्छ्र, भगन्दर, श्लीपद, कफ-वातजन्य रोग, रक्त और मांसगत रोग, मेदागत, धातुगत, कुलपरम्परासे होनेवाले बहुत पुराने रोग, गलेके रोग, सूजन, अन्त्रवृद्धि, दारुण अतीसार, सब प्रकारकी आमवात, जिह्वास्तम्भ, गलग्रह, उदर, कर्ण, नासिका, नेत्र और मुखके रोग, खाँसी, पीनस, राजयक्ष्मा, बवासीर, स्थूलता, दुर्गन्धि, सब प्रकारका शूल, शिरःशूल और स्त्रियोंके सब रोगोंको बहुत शीघ्र दूर करता ह ॥ ८७-९१ ॥

वटिकां प्रातरैकैकां खादेन्नित्यं यथाबलम् । अनुपानमिह प्रोक्तं मांसं पिष्टं पयो दधि ॥ ९२ ॥ वारितक्रसुरासीधुसेवनात्कामरूपधृक् । वृद्धोऽपि तरुणस्पर्शी न च शुक्रस्य संक्षयः ॥ ९३ ॥ न च लिङ्गस्य शैथिल्यं न केशा यान्ति पक्वताम् । नित्यं स्त्रीणां शतं गच्छेदन्मत्तवारणविक्रमः ॥ ९४ ॥ द्विलक्षयोजनी दृष्टिर्जायते पौष्टिकः परः । प्रोक्तः प्रयोगराजोऽ नारदेन महात्मना ॥ ९५ ॥ रसो लक्ष्मीविलासोऽयं वासुदेवे जगत्पतौ । प्रसादादस्य भगवान् लक्षनारीषु वल्लभः ॥ ९६ ॥

प्रतिदिन प्रातःकाल जठराग्निके बलानुसार इसकी एक गोली भक्षण करें और मांस, पिठ्ठी, दूध, दही, जल, मट्ठा, मदिरा और सीधुनामक काँजी इनके

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