भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१३३० भैषज्यरत्नावली । [ रसायन-
अनुपानरूपसे सेवन करे । इससे वृद्ध पुरुष भी कामदेवके समान स्वरूपवान् हो स्त्रियोंमें रमण करता है, वीर्य्यका नाश, लिंगकी शिथिलता नहीं होती तथा बाल पक्कावस्थाको कभी प्राप्त नहीं होते । मनुष्य उन्मत्त हाथीके समान पराक्रमी होकर सैंकडों स्त्रियोंको प्रतिदिन भोगता है । दो लाख योजनकी वस्तुको देखनेकी दृष्टि-शक्ति और अत्यन्त पुष्टि होती है । इस महालक्ष्मीविलासरसनामक प्रयोगराजको महात्मा नारदने जगत्पति भगवान् कृष्णचन्द्रसे वर्णन किया है । इसीके प्रतापसे भगवान् कृष्णचन्द्र एकलाख स्त्रियोंमें सर्वप्रिय हुए थे ॥
वसन्तकुसुमाकररस ।
द्विभागं हाटकं चन्द्रं त्रयो वङ्गाहिकान्तकाः ।
चतुर्भागं शुभ्रमभ्रं प्रवालं मौक्तिकं तथा ॥ ९७ ॥
भावयेद्गव्यदुग्धेन भावनेक्षुरसेन च ।
वासालाक्षारसोदीच्यरस्ताकन्दप्रसूनकैः ॥ ९८ ॥
शतपत्ररसेनैव मालत्याः कुङ्कुमोदकैः ।
पश्चान्मृगमदैर्भाव्यं सुगन्धिरससम्भवैः ॥ ९९ ॥
सोनेकी भस्म और चाँदीकी भस्म प्रत्येक दो दो तोले, वंग, सीसा और लोहा इनकी भस्म तीन तीन तोले, श्वेत अभ्रक, मूँगा और मोतीकी भस्म चार चार तोले लेवे। फिर सबको एकत्र पीसकर गौके दूध, ईखके रस, अडूसेकी छालके रस, लाखके क्वाथ और सुगन्धवालाके क्वाथ, केलेकी जडके रस, मोचरस, कमलके रस मालतीके फूलोंके रस, केशरके जल और कस्तूरीके क्वाथमें यथाक्रमसे अलग अलग सात सात बार भावनादेवे । फिर दो दो रत्तीकी गोलियाँ बना लेवे ॥
कुसुमाकरविख्यातो वसन्तपदपूर्वकः ।
गुञ्जाद्वयेन संसेव्यः सितामध्वाज्यसंयुतः ॥ १०० ॥
मेहघ्नः कान्तिदश्चैव कामदः पुष्टिदस्तथा ।
वलीपलितनाशश्च श्रुतिभ्रंशं विनाशयेत् ॥ १०१ ॥
पुष्टिदो बल्य आयुष्यः पुत्रप्रसवकारणम् ।
प्रमेहान्विंशतिं चैव क्षयमेकादशं तथा ॥
तथा सोमरुजं हन्ति साध्यासाध्यमथापि वा ॥ २ ॥
इसको वसन्तकुसुमाकररस कहते है । इसकी प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक मिश्री, शहद और घीके साथ मिलाकर सेवन करे तो यह प्रमेहको नाश